भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौता केवल दो देशों के बीच आर्थिक साझेदारी का विषय नहीं है बल्कि यह भारत की दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति औद्योगिक विकास और रणनीतिक स्वायत्तता से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है। दोनों देशों ने संकेत दिए हैं कि वार्ता अंतिम चरण में है और अधिकांश मुद्दों पर सहमति बन चुकी है। ऐसे समय में यह आवश्यक है कि समझौते का मूल्यांकन केवल तात्कालिक लाभ के आधार पर नहीं बल्कि राष्ट्रीय हितों की कसौटी पर किया जाए। हाल के दिनों में पूर्व भारतीय गुप्तचर अधिकारी विक्रम सूद द्वारा एक साक्षात्कार में किए गए दावे ने नई बहस को जन्म दिया है। उनके अनुसार अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडाऊ ने भारत की आर्थिक प्रगति और अमेरिका की रणनीति को लेकर कुछ ऐसी टिप्पणियां की थीं जिनसे यह संदेश जाता है कि वाशिंगटन भारत को एक मजबूत आर्थिक प्रतिस्पर्धी के रूप में उभरते देखने को लेकर पूरी तरह सहज नहीं है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है लेकिन यदि किसी भी स्तर पर ऐसी सोच मौजूद है तो यह भारत के लिए गंभीर विचार का विषय अवश्य है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई भी देश परोपकार के आधार पर निर्णय नहीं लेता। प्रत्येक राष्ट्र अपने आर्थिक और सामरिक हितों को प्राथमिकता देता है। अमेरिका भी अपने किसानों उद्योगों और तकनीकी कंपनियों के हितों की रक्षा करता है तो भारत से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वह अपने किसानों सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्योगों विनिर्माण क्षेत्र और उभरती प्रौद्योगिकी क्षमता की सुरक्षा सुनिश्चित करे। व्यापार समझौते का उद्देश्य दोनों पक्षों के लिए अवसर पैदा करना होना चाहिए न कि किसी एक पक्ष को असंतुलित लाभ पहुंचाना। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी विशाल आबादी तेजी से बढ़ता उपभोक्ता बाजार युवा कार्यबल और विस्तार करती अर्थव्यवस्था है। यही कारण है कि दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं भारत के साथ आर्थिक संबंध मजबूत करना चाहती हैं। ऐसे में भारत को किसी भी वार्ता में आत्मविश्वास के साथ अपनी शर्तें रखने का अधिकार है। खुला व्यापार तभी लाभकारी होता है जब वह पारस्परिक सम्मान और समान अवसरों के सिद्धांत पर आधारित हो।
यह भी ध्यान रखना होगा कि वैश्विक राजनीति तेजी से बदल रही है। अमेरिका चीन प्रतिस्पर्धा के बीच भारत की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है लेकिन भारत की विदेश नीति का मूल आधार हमेशा रणनीतिक स्वायत्तता रहा है। भारत ने किसी भी शक्ति गुट का स्थायी हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप निर्णय लेने की परंपरा विकसित की है। यही नीति भविष्य में भी देश के हितों की सबसे बड़ी सुरक्षा है। व्यापार समझौते को लेकर एक और महत्वपूर्ण प्रश्न पारदर्शिता का है। यदि समझौते के प्रावधानों का प्रभाव कृषि डिजिटल अर्थव्यवस्था औद्योगिक उत्पादन बौद्धिक संपदा या बाजार पहुंच जैसे क्षेत्रों पर पड़ने वाला है तो संसद उद्योग जगत और संबंधित हितधारकों को पर्याप्त जानकारी मिलनी चाहिए। व्यापक चर्चा से ही किसी समझौते की स्वीकार्यता और विश्वसनीयता बढ़ती है। भारत को अमेरिका के साथ मजबूत आर्थिक संबंधों की आवश्यकता है और अमेरिका भी भारत जैसे विशाल बाजार और विश्वसनीय साझेदार को नजरअंदाज नहीं कर सकता। इसलिए यह संबंध प्रतिस्पर्धा और सहयोग दोनों का संतुलित मिश्रण होना चाहिए। किसी भी समझौते में ऐसी शर्तें स्वीकार नहीं की जानी चाहिए जो भविष्य में भारत की औद्योगिक क्षमता रोजगार सृजन या तकनीकी आत्मनिर्भरता को कमजोर करें।
आज आवश्यकता भावनात्मक प्रतिक्रिया की नहीं बल्कि संतुलित और दूरदर्शी नीति की है। भारत को न तो अनावश्यक टकराव का रास्ता चुनना चाहिए और न ही किसी दबाव में अपने दीर्घकालिक हितों से समझौता करना चाहिए। यदि प्रस्तावित भारत अमेरिका व्यापार समझौता समानता पारदर्शिता और पारस्परिक लाभ के सिद्धांतों पर आधारित होगा तो वह दोनों देशों के लिए लाभकारी सिद्ध होगा। लेकिन यदि उसमें असंतुलन की आशंका है तो भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक हितों की रक्षा करते हुए दृढ़ता के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। यही एक उभरती वैश्विक शक्ति के अनुरूप नीति होगी।