भ्रष्टाचार पर प्रहार की चुनौती: केवल नारे नहीं व्यवस्था और समाज दोनों में बदलाव जरूरी

भ्रष्टाचार आज केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व के अधिकांश देशों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। यह केवल आर्थिक संसाधनों की चोरी नहीं बल्कि शासन व्यवस्था जनविश्वास और विकास की गति को कमजोर करने वाला गंभीर सामाजिक अपराध भी है। जब सार्वजनिक धन का दुरुपयोग होता है तो उसका सीधा प्रभाव शिक्षा स्वास्थ्य सड़क सिंचाई रोजगार और जनकल्याण जैसी मूलभूत सुविधाओं पर पड़ता है। यही कारण है कि लगभग हर सरकार भ्रष्टाचार के विरुद्ध जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाने की घोषणा करती है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल घोषणाएं और कानून इस समस्या का समाधान कर सकते हैं या इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रशासनिक पारदर्शिता और सामाजिक जागरूकता तीनों की समान आवश्यकता है। भ्रष्टाचार शब्द का अर्थ ही दूषित आचरण है। यह केवल रिश्वत लेने या सरकारी योजनाओं में घोटाला करने तक सीमित नहीं है बल्कि निजी लाभ के लिए नियमों नैतिकता और कानून की अनदेखी करना भी भ्रष्टाचार है। यदि कोई अधिकारी जानबूझकर अपना कर्तव्य नहीं निभाता कोई ठेकेदार निर्माण कार्य में घटिया सामग्री का उपयोग करता कोई व्यापारी कर चोरी करता कोई शिक्षक विद्यालय में पढ़ाने के बजाय केवल औपचारिकता निभाता या कोई नागरिक नियमों का उल्लंघन कर सुविधा शुल्क देकर बच निकलता है तो यह भी भ्रष्टाचार की ही श्रेणी में आता है। इसलिए भ्रष्टाचार को केवल नेताओं और अधिकारियों तक सीमित कर देखना उचित नहीं होगा। यह समाज की उस मानसिकता का भी परिणाम है जिसमें नियमों से अधिक महत्व शॉर्टकट को दिया जाने लगा है।

राजनीतिक जीवन में अक्सर विभिन्न विभागों को लेकर खींचतान देखने को मिलती है। लोक निर्माण परिवहन गृह खनन और शहरी विकास जैसे विभागों को प्रायः अधिक संसाधनों और बड़े सरकारी खर्च के कारण प्रभावशाली माना जाता है। ऐसे विभागों से जुड़े टेंडर लाइसेंस और परियोजनाएं पारदर्शिता की कसौटी पर हमेशा चर्चा का विषय रहती हैं। समय समय पर अनेक राज्यों में विभिन्न दलों के नेताओं मंत्रियों और अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। कई मामलों में जांच एजेंसियों ने कार्रवाई की है जबकि अनेक मामलों में न्यायिक प्रक्रिया अभी भी जारी है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को न्यायालय के अंतिम निर्णय से पहले दोषी मान लेना उचित नहीं होगा। लोकतंत्र में जवाबदेही और निष्पक्ष जांच दोनों समान रूप से आवश्यक हैं।

भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव विकास की गुणवत्ता पर पड़ता है। यदि किसी सड़क पुल अस्पताल या विद्यालय के निर्माण में धन का दुरुपयोग होता है तो परियोजना समय से पहले खराब हो जाती है और उसका नुकसान अंततः जनता को उठाना पड़ता है। सरकार को उसी कार्य पर दोबारा खर्च करना पड़ता है जिससे सार्वजनिक संसाधनों का अपव्यय होता है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि सामाजिक अन्याय भी है क्योंकि इसका सबसे अधिक असर गरीब और सामान्य नागरिक पर पड़ता है। यह तर्क भी कभी कभी दिया जाता है कि भ्रष्टाचार से अर्जित धन यदि देश के भीतर निवेश हो जाए तो अर्थव्यवस्था को कुछ लाभ मिल सकता है। लेकिन यह दृष्टिकोण अधूरा है। किसी भी स्वस्थ अर्थव्यवस्था की मजबूती पारदर्शी निवेश निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और कानून के शासन पर आधारित होती है। अवैध धन का निवेश असमानता बढ़ाता है ईमानदार उद्यमियों को नुकसान पहुंचाता है और बाजार व्यवस्था को विकृत करता है। इसलिए भ्रष्टाचार से प्राप्त धन का किसी भी रूप में निवेश उसके मूल अपराध को उचित नहीं ठहरा सकता।

भ्रष्टाचार की जड़ें केवल व्यवस्था में नहीं बल्कि समाज की सोच में भी मौजूद हैं। जब हम लाइसेंस जल्दी बनवाने के लिए सुविधा शुल्क देते हैं यातायात नियम तोड़कर रिश्वत देकर बच निकलते हैं या अपने छोटे लाभ के लिए नियमों की अनदेखी करते हैं तब अनजाने में उसी व्यवस्था को मजबूत करते हैं जिसकी शिकायत बाद में करते हैं। इसलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध सबसे प्रभावी लड़ाई स्वयं से शुरू होती है। ईमानदारी केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं बल्कि प्रत्येक नागरिक का भी कर्तव्य है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई किसी एक सरकार किसी एक दल या किसी एक संस्था की नहीं है। यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक राजनीतिक इच्छाशक्ति प्रशासनिक पारदर्शिता और नागरिक ईमानदारी एक साथ नहीं आएंगे तब तक केवल जीरो टॉलरेंस का नारा पर्याप्त नहीं होगा। देश को ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें ईमानदारी अपवाद नहीं बल्कि सामान्य व्यवहार बने और भ्रष्टाचार लाभ का नहीं बल्कि सबसे बड़े जोखिम का पर्याय बन जाए। तभी सुशासन मजबूत होगा विकास की गति तेज होगी और लोकतंत्र पर जनता का विश्वास और अधिक सुदृढ़ होगा।