इबोला का बढ़ता खतरा : सतर्कता और वैज्ञानिक तैयारी की जरूरत

कांगो में तेजी से फैल रहे इबोला वायरस ने एक बार फिर दुनिया की चिंताओं को बढ़ा दिया है। अफ्रीका के जंगलों से निकलकर यह घातक बीमारी वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए नई चुनौती बनती दिखाई दे रही है। डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के इटुरी प्रांत में संक्रमण के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य एजेंसियों को सतर्क कर दिया है। पड़ोसी देशों में भी संक्रमण के मामले सामने आने से आशंका व्यक्त की जा रही है कि यदि समय रहते प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया तो इसका दायरा और बढ़ सकता है।

इबोला कोई नई बीमारी नहीं है। अतीत में भी अफ्रीकी देशों में इसके कई बड़े प्रकोप देखे जा चुके हैं। वर्ष 2014 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में फैली महामारी ने हजारों लोगों की जान ली थी। हालांकि इस बार वैज्ञानिक वायरस के नए स्वरूपों और उनके प्रभाव को लेकर विशेष चिंता जता रहे हैं। कुछ स्ट्रेनों के लिए प्रभावी उपचार और टीकाकरण की सीमित उपलब्धता चुनौती को और गंभीर बना देती है। भारत में अब तक इबोला का कोई पुष्ट मामला सामने नहीं आया है, लेकिन वैश्विक अनुभवों को देखते हुए स्वास्थ्य एजेंसियां सतर्क हैं। अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर निगरानी बढ़ाई गई है तथा संदिग्ध लक्षण पाए जाने पर आइसोलेशन और जांच की व्यवस्था की गई है। कोरोना महामारी से मिले अनुभवों के आधार पर स्क्रीनिंग, निगरानी और जनजागरूकता पर विशेष बल दिया जा रहा है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी सहित विभिन्न संस्थान वैश्विक घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

इबोला वायरस फिलोविरिडे परिवार का सदस्य है। यह मुख्य रूप से संक्रमित जंगली जानवरों, विशेषकर फल खाने वाले चमगादड़ों, से मनुष्यों में फैल सकता है। इसके बाद संक्रमित व्यक्ति के रक्त, शारीरिक द्रवों अथवा निकट संपर्क के माध्यम से संक्रमण फैलने की आशंका रहती है। तेज बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, उल्टी, दस्त, अत्यधिक कमजोरी और गंभीर मामलों में रक्तस्राव इसके प्रमुख लक्षण हैं। संक्रमण की पुष्टि प्रयोगशाला जांच के माध्यम से की जाती है। भारत जैसे विशाल और घनी आबादी वाले देश में किसी भी संक्रामक रोग का खतरा अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। स्वास्थ्य सुविधाओं में क्षेत्रीय असमानता और बड़ी जनसंख्या के कारण संक्रमण नियंत्रण के प्रयासों को अतिरिक्त सावधानी की आवश्यकता होती है। इसके साथ ही सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहें और भ्रामक सूचनाएं भी संकट को बढ़ा सकती हैं। कोरोना काल में फर्जी उपचारों और अप्रमाणित दावों ने लोगों में भ्रम और भय का वातावरण पैदा किया था। इसलिए इस बार भी वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित जानकारी का प्रसार अत्यंत आवश्यक है। इबोला के संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भय को संक्रमण नियंत्रण का आधार नहीं बनने देना चाहिए। डर के कारण लोग लक्षण छिपाते हैं, जांच कराने से बचते हैं और समय पर उपचार नहीं ले पाते। ऐसी स्थिति में बीमारी के फैलने का जोखिम बढ़ जाता है। इसलिए जागरूकता, शीघ्र पहचान और चिकित्सा परामर्श ही सबसे प्रभावी उपाय हैं।

दुनिया भर के वैज्ञानिक और शोध संस्थान इबोला की रोकथाम और उपचार के बेहतर साधनों की खोज में लगे हुए हैं। नए टीकों और दवाओं पर शोध जारी है। उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में इस दिशा में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त होगी। भारत सरकार द्वारा जारी स्वास्थ्य परामर्शों का पालन करना, अनावश्यक जोखिम से बचना और सार्वजनिक स्वास्थ्य नियमों का सम्मान करना वर्तमान समय की आवश्यकता है। इबोला हमें यह याद दिलाता है कि संक्रामक रोगों के खिलाफ लड़ाई कभी समाप्त नहीं होती। ऐसे में घबराने के बजाय सतर्कता, वैज्ञानिक सोच और सामूहिक जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ना ही सबसे उचित रास्ता है।