भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश है और यही उसकी सबसे बड़ी ताकत भी है। लेकिन यदि यही युवा आर्थिक तंगी के कारण उच्च शिक्षा से वंचित होने लगे तो यह केवल शिक्षा का संकट नहीं बल्कि देश के भविष्य का संकट होगा। हाल ही में संसदीय स्थायी समिति ने शिक्षा पर खर्च बढ़ाकर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का छह प्रतिशत करने की सिफारिश की है। समिति ने स्पष्ट कहा है कि वर्तमान बजट आवंटन देश की जरूरतों के अनुरूप नहीं है। वर्ष 2021-22 में शिक्षा पर कुल सार्वजनिक व्यय जीडीपी का केवल 4.12 प्रतिशत रहा जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के निर्धारित लक्ष्य से काफी कम है। यह स्थिति बताती है कि भारत को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था बनाने के लिए शिक्षा में निवेश बढ़ाना अब विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता है। उच्च शिक्षा आज लगातार महंगी होती जा रही है। फीस में हर वर्ष होने वाली वृद्धि ने सामान्य परिवारों के लिए विश्वविद्यालयों और पेशेवर संस्थानों तक पहुंच कठिन बना दी है। विशेषज्ञों के अनुसार शिक्षा की लागत 10 से 12 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से बढ़ रही है जिसके कारण हर छह से सात वर्ष में पढ़ाई का खर्च लगभग दोगुना हो जाता है। आधुनिक प्रयोगशालाएं डिजिटल तकनीक अनुसंधान बुनियादी ढांचे का विकास योग्य शिक्षकों का वेतन और नियामकीय मानकों का पालन जैसी आवश्यकताओं ने संस्थानों की लागत बढ़ाई है। दूसरी ओर गुणवत्तापूर्ण संस्थानों की संख्या सीमित होने के कारण मांग और आपूर्ति के असंतुलन ने निजी संस्थानों को मनमानी फीस वसूलने का अवसर भी दिया है।
चिंताजनक तथ्य यह है कि अब केवल निजी संस्थान ही नहीं बल्कि कई सरकारी संस्थानों की फीस भी तेजी से बढ़ी है। भारतीय प्रबंधन संस्थानों की फीस में पिछले डेढ़ दशक में कई गुना वृद्धि इसका उदाहरण है। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यम वर्गीय परिवारों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि वे अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्च कैसे उठाएं। लाखों विद्यार्थियों को शिक्षा ऋण लेना पड़ता है और नौकरी शुरू करने से पहले ही वे कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं। जिन परिवारों के पास संसाधन नहीं हैं वे जमीन गिरवी रखते हैं बचत खत्म करते हैं या फिर बच्चों की पढ़ाई बीच में ही रुक जाती है। इसका सबसे अधिक दुष्प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों और लड़कियों की शिक्षा पर पड़ता है। जब परिवार आर्थिक संकट में होता है तो सबसे पहले बेटियों की पढ़ाई पर रोक लगाई जाती है। इससे वर्षों की मेहनत से कम हुआ लैंगिक अंतर फिर बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है। यदि शिक्षा केवल आर्थिक रूप से सक्षम वर्ग तक सीमित रह गई तो सामाजिक न्याय समान अवसर और समावेशी विकास जैसे संवैधानिक आदर्श कमजोर पड़ जाएंगे।
एक और गंभीर समस्या यह है कि देश के अनेक विश्वविद्यालय और कॉलेज केवल नामांकन और परीक्षा केंद्र बनकर रह गए हैं। छात्र डिग्री के लिए कॉलेज में दाखिला लेते हैं लेकिन वास्तविक शिक्षा के लिए कोचिंग संस्थानों का सहारा लेते हैं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता और रोजगार क्षमता दोनों प्रभावित होती हैं। संसदीय समिति ने भी सकल नामांकन अनुपात में अपेक्षित वृद्धि न होने पर चिंता व्यक्त की है। यदि उच्च शिक्षा तक पहुंच सीमित रही तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का वर्ष 2035 तक अधिक नामांकन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य अधूरा रह जाएगा। समाधान केवल फीस नियंत्रण तक सीमित नहीं हो सकता। सरकार को शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश बढ़ाना होगा और जीडीपी के छह प्रतिशत खर्च के लक्ष्य को समयबद्ध तरीके से लागू करना होगा। सरकारी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की संख्या तथा क्षमता बढ़ानी होगी। छात्रवृत्ति और शिक्षा ऋण योजनाओं को अधिक व्यापक और सुलभ बनाना होगा ताकि आर्थिक स्थिति किसी प्रतिभाशाली छात्र की राह में बाधा न बने। साथ ही विश्वविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण अनुसंधान उद्योग से जुड़ाव और रोजगारोन्मुख पाठ्यक्रमों को प्राथमिकता देनी होगी ताकि विद्यार्थी अपनी शिक्षा का वास्तविक लाभ प्राप्त कर सकें।
शिक्षा कोई साधारण उपभोक्ता वस्तु नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। यदि उच्च शिक्षा लगातार महंगी होती रही तो समाज का बड़ा वर्ग अवसरों से वंचित हो जाएगा और आर्थिक तथा सामाजिक असमानता और गहरी होगी। भारत यदि विकसित राष्ट्र बनने का सपना देखता है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी प्रतिभाशाली छात्र का भविष्य केवल इसलिए अंधकारमय न हो क्योंकि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर है। शिक्षा पर किया गया निवेश खर्च नहीं बल्कि देश के भविष्य में किया गया सबसे बड़ा निवेश होता है।