वैश्विक संकट के बीच भारत के लिए अवसरों का नया दौर

विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था इस समय तेज़ बदलाव के दौर से गुजर रही है। एक ओर पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बनकर उभरा है तो दूसरी ओर भारत अपनी सक्रिय कूटनीति के माध्यम से नए आर्थिक अवसरों की तलाश में लगातार आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री की इंडोनेशिया ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की हालिया यात्रा इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा सकती है। भारत की विदेश नीति अब केवल राजनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि उसका स्पष्ट उद्देश्य आर्थिक हितों को मजबूत करना भी है। इंडोनेशिया के साथ रक्षा और समुद्री सहयोग ऑस्ट्रेलिया के साथ क्रिटिकल मिनरल्स तथा सेमीकंडक्टर क्षेत्र में साझेदारी और न्यूजीलैंड के साथ मुक्त व्यापार की दिशा में बढ़ते कदम यह संकेत देते हैं कि भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी भूमिका को और मजबूत करना चाहता है। यदि इन समझौतों का प्रभावी क्रियान्वयन होता है तो विनिर्माण निर्यात रोजगार और निवेश के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

दूसरी ओर ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता सैन्य तनाव पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में यदि पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ती है और तेल की कीमतों में तेज़ उछाल आता है तो उसका सीधा असर महंगाई परिवहन लागत और उद्योगों पर पड़ेगा। इसका प्रभाव आम उपभोक्ता से लेकर शेयर बाजार तक दिखाई देगा। ऐसी परिस्थितियों में भारत के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर ऊर्जा सुरक्षा और महंगाई पर नियंत्रण बनाए रखना होगा तो दूसरी ओर वैश्विक निवेशकों का विश्वास भी कायम रखना होगा। इसके लिए बुनियादी ढांचे का विस्तार उत्पादन क्षमता में वृद्धि ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का विकास और नीतिगत स्थिरता अत्यंत आवश्यक होगी।

आज वैश्विक कंपनियां अपनी आपूर्ति श्रृंखला को चीन पर निर्भरता से बाहर निकालने का प्रयास कर रही हैं। यदि भारत इस अवसर का लाभ उठाने में सफल रहता है तो वह केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार नहीं बल्कि विश्व का प्रमुख विनिर्माण और निवेश केंद्र बन सकता है। इसके लिए सुधारों की गति बनाए रखना और व्यापारिक समझौतों को व्यवहारिक परिणामों तक पहुंचाना सबसे महत्वपूर्ण होगा। भारत की सक्रिय कूटनीति और आर्थिक दूरदृष्टि निश्चित रूप से भविष्य की मजबूत नींव तैयार कर सकती है। हालांकि केवल समझौतों पर हस्ताक्षर करना पर्याप्त नहीं है बल्कि उनका समयबद्ध और प्रभावी क्रियान्वयन ही उनकी वास्तविक सफलता तय करेगा। वैश्विक संकटों के बीच अवसरों को पहचानकर उन्हें राष्ट्रीय विकास में बदलना ही आने वाले वर्षों में भारत की सबसे बड़ी परीक्षा और सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।