मथुरा। जनपद में राजस्व विभाग से जुड़ी समस्याएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाली कहावत यहां के हालात पर सटीक बैठती नजर आ रही है। सदर और गोवर्धन तहसील क्षेत्रों में सरकारी चकरोड और नालियों के मामलों को सुलझाने में करीब 26 साल बीत जाने के बावजूद स्थिति जस की तस बनी हुई है।
ज़िला गंगा समिति सदस्य दिलीप कुमार यादव ने आरोप लगाया है कि लेखपाल और राजस्व कर्मी लगातार फर्जी निस्तारण कर रहे हैं और उच्च अधिकारियों को भी गुमराह किया जा रहा है। उनका कहना है कि पैमाइश के नाम पर किसानों की जमीनों पर कब्जा कराने तक से परहेज नहीं किया जा रहा।
गोवर्धन तहसील के अड़ींग गांव समेत कई क्षेत्रों में ऐसे मामले सामने आए हैं जहां वर्षों से चकरोड और नाली की समस्याएं लंबित हैं। यादव ने बताया कि उन्होंने 8 मई को मंडलायुक्त से शिकायत की थी, जिस पर 10 दिन में आख्या मांगी गई थी, लेकिन हाल ही में लेखपाल ने महज 10 मिनट में औपचारिक निरीक्षण कर खानापूर्ति कर दी।
वहीं, एसडीएम गोवर्धन द्वारा पैमाइश के दौरान पुलिस बल देने से इनकार किए जाने पर भी सवाल उठ रहे हैं। सोमवार को श्री यादव ने पुलिस की मौजूदगी में पैमाइश की मांग की, लेकिन एसडीएम ने इसे खारिज करते हुए केवल तहसीलदार को तिथि तय कर किसानों को सूचित करने के निर्देश दिए।
चकबंदी विभाग की रिपोर्ट में भी स्पष्ट किया गया है कि धारा 52 का प्रकाशन हुए करीब डेढ़ दशक बीत चुका है, इसके बावजूद चकबंदी लेखपाल की तैनाती पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
इधर, अड़ींग के किसान सूरजभान ने आरोप लगाया कि खसरा संख्या 48 की चकरोड और उससे सटी नाली को रिकॉर्ड से ज्यादा चौड़ा करने की कोशिश की जा रही है, जबकि नाली को नजरअंदाज किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि अवैध कॉलोनी विकसित करने वालों से मिलीभगत के चलते यह खेल चल रहा है।
वहीं, किसान रवि पंडित ने भी शिकायत की कि उनके खेत से सटी नाली और चकरोड की कई बार शिकायत के बावजूद आज तक सही तरीके से पैमाइश नहीं कराई गई।
लगातार बढ़ती शिकायतों के बीच सवाल उठ रहा है कि आखिर कब तक किसानों को न्याय मिलेगा और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार होगा।
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