दुनिया भर में तेजी से बदलते जलवायु परिदृश्य के बीच “अलनीनो” एक बार फिर भारत के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य वृद्धि से उत्पन्न होने वाली यह मौसमी घटना भारतीय मानसून को सीधे प्रभावित करती है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मानसून की थोड़ी-सी अस्थिरता भी खेती, जल संसाधनों, अर्थव्यवस्था और आम जनजीवन पर व्यापक असर डालती है। ऐसे में यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या भारत अलनीनो जैसी चुनौती का सामना करने के लिए पर्याप्त रूप से तैयार है।
भारत की लगभग आधी खेती आज भी वर्षा पर निर्भर है। अलनीनो के प्रभाव से मानसून कमजोर पड़ता है, वर्षा में कमी आती है और कई राज्यों में सूखे जैसी स्थिति बन जाती है। इसका सबसे बड़ा असर किसानों पर पड़ता है। खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित होती है, उत्पादन घटता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होने लगती है। धान, मक्का, सोयाबीन, दालें और गन्ना जैसी फसलें पर्याप्त वर्षा पर आधारित हैं, इसलिए अलनीनो का प्रभाव इन पर सबसे अधिक दिखाई देता है।
विशेष रूप से धान की खेती अलनीनो से गंभीर रूप से प्रभावित होती है क्योंकि इसे अधिक पानी की आवश्यकता होती है। कमजोर मानसून के कारण खेतों में नमी कम हो जाती है और उत्पादन घटने लगता है। दालों और तिलहन की फसलें भी इससे प्रभावित होती हैं। पशुपालन क्षेत्र पर भी असर पड़ता है क्योंकि चारे और पानी की उपलब्धता कम हो जाती है। कृषि उत्पादन में गिरावट का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। खाद्यान्न की कीमतें बढ़ती हैं, महंगाई बढ़ती है और आम जनता पर आर्थिक दबाव बढ़ जाता है।
हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भारत ने इस दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। भारतीय मौसम विभाग पहले की तुलना में अधिक सटीक मौसम पूर्वानुमान जारी कर रहा है। उपग्रह तकनीक और आधुनिक वैज्ञानिक प्रणालियों के माध्यम से मानसून की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है। इससे राज्यों और किसानों को समय रहते तैयारी करने में मदद मिलती है। कृषि क्षेत्र में भी बदलाव की दिशा में प्रयास हो रहे हैं। सरकार सूखा-रोधी बीजों को बढ़ावा दे रही है और किसानों को कम पानी वाली फसलों की ओर प्रेरित किया जा रहा है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान की भरपाई में सहायक बन रही है। वहीं प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों को प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि कम पानी में अधिक उत्पादन संभव हो सके। जल संरक्षण की दिशा में भी कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं। जल शक्ति अभियान, वर्षा जल संचयन, तालाबों के पुनर्जीवन और भूजल संरक्षण जैसे कार्यक्रमों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। कई राज्यों में सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से स्थानीय जल प्रबंधन को मजबूत बनाने की कोशिश हो रही है। यह समझना आवश्यक है कि आने वाले समय में जल संकट सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल होगा। ऊर्जा क्षेत्र में भी भारत अब केवल जलविद्युत पर निर्भर नहीं रहना चाहता। सौर और पवन ऊर्जा के विस्तार से ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में काम हो रहा है। यदि सूखे के कारण जलाशयों का स्तर घटे, तब भी बिजली संकट को सीमित किया जा सकेगा।
इसके बावजूद यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत पूरी तरह तैयार है। आज भी अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं। कई जल संरक्षण योजनाएं केवल कागजों तक सिमट जाती हैं। किसानों तक समय पर सही जानकारी और तकनीकी सहायता पहुंचाने में भी कमियां दिखाई देती हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि जलवायु परिवर्तन अब पहले की तुलना में अधिक अनिश्चित और गंभीर हो चुका है। अलनीनो जैसी प्राकृतिक घटनाएं यह स्पष्ट संकेत देती हैं कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए बिना भविष्य सुरक्षित नहीं रह सकता। भारत को केवल राहत योजनाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी। जल संरक्षण, वैज्ञानिक खेती, हरित ऊर्जा, फसल विविधीकरण और पर्यावरण सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना समय की मांग है। यदि केंद्र और राज्य सरकारें, वैज्ञानिक संस्थान, किसान और आम नागरिक मिलकर जिम्मेदारी निभाएं, तो भारत अलनीनो जैसी चुनौतियों का मजबूती से सामना कर सकता है। संकट निश्चित रूप से बड़ा है, लेकिन सामूहिक प्रयास और दूरदर्शी नीतियां उससे भी अधिक शक्तिशाली साबित हो सकती हैं।