आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला…

भारत में आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या, डॉग बाइट की भयावह घटनाएं और रेबीज संक्रमण लंबे समय से सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा शहरी प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। 19 मई 2026 को भारतीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया फैसला इस बहस को केवल प्रशासनिक या भावनात्मक दायरे से निकालकर संवैधानिक विमर्श के केंद्र में ले आया है। यह निर्णय आने वाले समय में नगर निकायों, राज्य सरकारों, पशु कल्याण संगठनों और नागरिक समाज के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित होगा।

सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि संविधान का अनुच्छेद 21 केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं देता, बल्कि भयमुक्त, सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन का अधिकार भी सुनिश्चित करता है। यदि बच्चे स्कूल जाते समय कुत्तों के झुंड से डरें, बुजुर्ग पार्कों और सड़कों पर निकलने से भयभीत हों अथवा अस्पतालों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थान असुरक्षा के केंद्र बन जाएं, तो राज्य मूकदर्शक नहीं रह सकता। यही कारण है कि अदालत ने नवंबर 2025 के आदेश में किसी भी प्रकार की ढील देने से इनकार करते हुए नागरिक सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। यह फैसला इसलिए भी ऐतिहासिक माना जाएगा क्योंकि अदालत ने पहली बार इतने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पशु अधिकार महत्वपूर्ण हैं, किंतु वे मानव जीवन और सार्वजनिक स्वास्थ्य से ऊपर नहीं हो सकते। न्यायालय ने स्कूलों, अस्पतालों, बस स्टैंडों, रेलवे स्टेशनों और खेल परिसरों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों से पकड़े गए आवारा कुत्तों को दोबारा उसी स्थान पर छोड़ने पर रोक लगाते हुए उन्हें शेल्टर होम्स और पुनर्वास केंद्रों में रखने का निर्देश दिया है। साथ ही रेबीज संक्रमित और अत्यधिक आक्रामक कुत्तों के विरुद्ध कानूनसम्मत कार्रवाई तथा आवश्यक परिस्थितियों में इच्छामृत्यु की अनुमति भी महत्वपूर्ण संकेत देती है। दरअसल यह पूरा विवाद केवल कुत्तों के संरक्षण का नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता का भी आईना है। अदालत के समक्ष प्रस्तुत आंकड़ों ने स्थिति की भयावहता उजागर कर दी। राजस्थान के श्रीगंगानगर में मात्र 30 दिनों में 1084 डॉग बाइट के मामले सामने आए जबकि तमिलनाडु में चार महीनों में दो लाख से अधिक लोग कुत्तों के हमलों का शिकार हुए। यह केवल नगर निकायों की लापरवाही नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का संकेत है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि पशु जन्म नियंत्रण नियमों और एंटी रेबीज टीकाकरण कार्यक्रमों का प्रभावी क्रियान्वयन वर्षों से नहीं हो पाया। अधिकांश राज्यों में नसबंदी केंद्रों की कमी, पशु चिकित्सकों का अभाव, वैक्सीन की अनुपलब्धता और नगर निकायों के बीच समन्वयहीनता ने समस्या को और गंभीर बना दिया। अदालत की यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि यदि एनिमल बर्थ कंट्रोल नियमों को समय पर लागू किया गया होता तो आज हालात इतने भयावह नहीं होते। हालांकि इस निर्णय के व्यावहारिक पक्ष भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं हैं। देश में करोड़ों की संख्या में मौजूद आवारा कुत्तों के लिए पर्याप्त शेल्टर होम्स, चिकित्सालय, प्रशिक्षित स्टाफ और वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था करना आसान नहीं होगा। पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने भी इस पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि देशभर में प्रभावी शेल्टर व्यवस्था स्थापित करने के लिए लाखों करोड़ रुपये की आवश्यकता पड़ सकती है। नगर निकाय पहले ही कचरा प्रबंधन, जल निकासी और बुनियादी शहरी सुविधाओं के संकट से जूझ रहे हैं। ऐसे में यह स्पष्ट है कि केवल न्यायिक आदेश से समस्या का समाधान नहीं होगा।

इस फैसले ने पशु अधिकार आंदोलन को भी नई दिशा दी है। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 51ए (जी) के तहत पशुओं के प्रति करुणा के नागरिक कर्तव्य को स्वीकार किया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि करुणा का अर्थ नागरिकों की सुरक्षा से समझौता नहीं हो सकता। यह संतुलन ही इस निर्णय की सबसे बड़ी विशेषता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विभिन्न देशों ने अलग-अलग मॉडल अपनाए हैं। यूरोप के कई देशों में अनिवार्य पंजीकरण, नियंत्रित प्रजनन और मजबूत शेल्टर व्यवस्था लागू है, जबकि कुछ देशों में आक्रामक कुत्तों के लिए कठोर नीति अपनाई जाती है। भारत को भी अब भावनात्मक बहस से आगे बढ़कर वैज्ञानिक, व्यावहारिक और दीर्घकालिक नीति अपनानी होगी। सर्वोच्च अदालत का यह निर्णय वास्तव में देश के शहरी प्रशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति और संवैधानिक दायित्वों की परीक्षा है। यदि राज्य सरकारें और नगर निकाय आधुनिक शेल्टर होम्स, प्रभावी नसबंदी, व्यापक टीकाकरण और डेटा आधारित नीति लागू करने में सफल होते हैं, तो भारत पहली बार आवारा कुत्तों की समस्या का संगठित समाधान खोज सकता है। लेकिन यदि यह फैसला केवल फाइलों और बैठकों तक सीमित रहा, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अदालत पशु विरोधी नहीं है, लेकिन जब प्रश्न बच्चों की सुरक्षा, नागरिकों के जीवन और सार्वजनिक स्वास्थ्य का हो, तब राज्य की पहली जिम्मेदारी मनुष्यों की रक्षा करना है। यही कारण है कि 19 मई 2026 का यह फैसला भारतीय न्यायिक इतिहास में केवल “डॉग बाइट केस” नहीं बल्कि जनसुरक्षा और पशु अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने वाले ऐतिहासिक निर्णय के रूप में याद किया जाएगा।