देश में हाल ही में सामने आई अमानक और गुणवत्ता में फेल दवाओं की खबरों ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। जिन दवाओं को लोग अपने जीवन की रक्षा और बीमारी से मुक्ति की आशा में खरीदते हैं यदि वही दवाएं उनके शरीर में जहर का काम करने लगें तो यह केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं के पतन का भयावह उदाहरण है। केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन द्वारा जारी ड्रग अलर्ट में हृदय रोग उच्च रक्तचाप मधुमेह संक्रमण मिर्गी विटामिन सप्लीमेंट और कफ सिरप जैसी अनेक दवाओं के नमूने फेल पाए गए। यह स्थिति अत्यंत गंभीर और चिंताजनक है क्योंकि इसका सीधा संबंध करोड़ों लोगों के जीवन और स्वास्थ्य से है।
भारत को दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है। भारतीय दवाइयां विश्व के अनेक देशों में निर्यात होती हैं और कोरोना महामारी के दौरान भारत ने पूरी दुनिया को दवाइयों और वैक्सीन की आपूर्ति कर अपनी विश्वसनीयता सिद्ध की थी। लेकिन अब जब भारतीय दवा कंपनियों की दवाओं में गुणवत्ता संबंधी खामियां सामने आ रही हैं तो इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की प्रतिष्ठा को भी आघात पहुंच रहा है। जिन राज्यों में घटिया दवाओं के नमूने फेल पाए गए उनमें हिमाचल प्रदेश उत्तराखंड गुजरात पंजाब राजस्थान उत्तर प्रदेश मध्य प्रदेश हरियाणा महाराष्ट्र तमिलनाडु और कई अन्य राज्य शामिल हैं। इससे स्पष्ट है कि समस्या किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं बल्कि व्यापक स्तर पर फैल चुकी है। सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि जिन दवाओं का उपयोग बच्चों बुजुर्गों और गंभीर रोगियों के उपचार में किया जाता है उन्हीं में गुणवत्ता संबंधी खामियां मिल रही हैं। कफ सिरप के अनेक नमूनों का फेल होना यह संकेत देता है कि पहले जिन भारतीय कफ सिरप पर विदेशों में बच्चों की मौत के आरोप लगे थे उनमें सच्चाई हो सकती है। यह केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि मानवता के खिलाफ अपराध है। जिस उद्योग का उद्देश्य जीवन बचाना हो यदि उसमें लालच और मुनाफाखोरी हावी हो जाए तो समाज के लिए इससे बड़ी त्रासदी कोई और नहीं हो सकती। विडंबना यह है कि देश में दवा निर्माण के लिए कठोर नियम और जांच की व्यवस्थाएं मौजूद हैं। कच्चे माल से लेकर उत्पादन और वितरण तक कई स्तरों पर परीक्षण होते हैं। इसके बावजूद यदि बड़ी कंपनियों की दवाइयां अमानक पाई जाती हैं तो यह स्पष्ट संकेत है कि कहीं न कहीं निगरानी तंत्र कमजोर पड़ा है या फिर प्रभाव और धनबल के कारण दोषियों पर समय रहते कार्रवाई नहीं हो पा रही है। कई बार राज्य सरकारें और नियामक एजेंसियां प्रभावशाली कंपनियों के खिलाफ कठोर कदम उठाने से बचती दिखाई देती हैं जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि दवा नियंत्रण व्यवस्था को और अधिक सशक्त और पारदर्शी बनाया जाए। केवल ड्रग अलर्ट जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। जिन कंपनियों की दवाइयां बार बार गुणवत्ता परीक्षण में फेल होती हैं उनके लाइसेंस तत्काल रद्द किए जाने चाहिए और उनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। नकली दवाइयों और दवा माफियाओं के खिलाफ विशेष अभियान चलाने की जरूरत है। दोषियों को केवल आर्थिक जुर्माने तक सीमित रखना समस्या का समाधान नहीं है बल्कि उन्हें कठोर कारावास की सजा मिलनी चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी मानव जीवन से खिलवाड़ करने का साहस न कर सके। दवा उद्योग केवल व्यापार नहीं बल्कि विश्वास का उद्योग है। रोगी डॉक्टर की सलाह पर दवा खरीदता है क्योंकि उसे भरोसा होता है कि यह दवा उसके जीवन की रक्षा करेगी। यदि यही भरोसा टूटने लगे तो समाज में भय और असुरक्षा का वातावरण पैदा होना स्वाभाविक है। इसलिए दवा कंपनियों को यह समझना होगा कि उनका पहला दायित्व लाभ कमाना नहीं बल्कि मानव जीवन की रक्षा करना है। नैतिकता और गुणवत्ता के बिना कोई भी उद्योग लंबे समय तक सम्मान नहीं पा सकता। इसके साथ ही आम जनता को भी जागरूक होने की आवश्यकता है। दवा खरीदते समय बिल लेना पैकेजिंग और निर्माण तिथि की जांच करना तथा संदिग्ध दवाओं की शिकायत संबंधित विभागों को करना बेहद जरूरी है।
मेडिकल स्टोरों की नियमित निगरानी भी आवश्यक है ताकि नकली और घटिया दवाओं की बिक्री पर रोक लगाई जा सके। भारत आज विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। डिजिटल इंडिया मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियान देश को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन यदि जीवनरक्षक दवाओं में ही मिलावट और घटियापन सामने आएगा तो यह विकसित भारत के सपने पर गहरा धब्बा होगा। आर्थिक विकास के साथ साथ नैतिकता गुणवत्ता और विश्वसनीयता को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।