तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर सनातन धर्म को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन द्वारा विधानसभा में दिया गया यह बयान कि “लोगों को बांटने वाले सनातन धर्म को खत्म किया जाना चाहिए” न केवल करोड़ों लोगों की आस्था को आहत करता है बल्कि भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा पर भी प्रश्नचिह्न लगाने जैसा है। इससे पहले भी वे सनातन धर्म की तुलना डेंगू, मलेरिया और कोरोना जैसी बीमारियों से कर चुके हैं। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी को है लेकिन यह स्वतंत्रता किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का अधिकार नहीं देती। विशेष रूप से सार्वजनिक जीवन
से जुड़े लोगों को अपने शब्दों की गंभीरता और उनके सामाजिक प्रभाव को समझना चाहिए।
सनातन धर्म केवल पूजा-पद्धति का नाम नहीं है बल्कि यह भारत की हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक चेतना और जीवन दर्शन का आधार है। जब विश्व के अनेक हिस्सों में सभ्यता प्रारंभिक अवस्था में थी तब भारत में वेद, उपनिषद, गीता और पुराण मानव जीवन के उच्चतम आदर्शों की व्याख्या कर रहे थे। सत्य, अहिंसा, करुणा, सेवा, प्रकृति संरक्षण, परिवार व्यवस्था और मानवता का संदेश इसी परंपरा से निकला। “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे विचार आज भी पूरी दुनिया को सह-अस्तित्व और शांति का मार्ग दिखाते हैं।
भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं बल्कि उसकी संस्कृति से होती है और उस संस्कृति की आत्मा सनातन परंपरा है। योग, आयुर्वेद, गीता, रामायण, महाभारत, गुरुकुल परंपरा और “अतिथि देवो भव” जैसे संस्कार इसी सनातन चेतना की देन हैं। आज पूरा विश्व भारतीय अध्यात्म और योग को अपना रहा है। ऐसे समय में यदि भारत में ही कुछ लोग सनातन को समाप्त करने की बात करें तो यह अपनी जड़ों से दूरी और वैचारिक अहंकार का संकेत माना जाएगा। यह भी सत्य है कि समाज में समय-समय पर कुछ कुरीतियां आईं और उनका विरोध भी इसी देश के संतों और समाज सुधारकों ने किया। सती प्रथा और अस्पृश्यता जैसी बुराइयों को समाप्त करने का आंदोलन भी भारतीय समाज के भीतर से ही उठा। लेकिन कुछ सामाजिक विकृतियों के आधार पर पूरी सनातन परंपरा को दोषी ठहराना उचित नहीं कहा जा सकता। किसी भी संस्कृति का मूल्यांकन उसके मूल सिद्धांतों से होना चाहिए न कि समय के साथ जुड़ी विकृतियों से।
चिंता की बात यह भी है कि आज हिंदू देवी-देवताओं और सनातन परंपराओं पर टिप्पणी करना कुछ लोगों के लिए फैशन बन गया है। फिल्मों, राजनीति और सोशल मीडिया पर बार-बार हिंदू आस्थाओं को निशाना बनाया जाता है जबकि अन्य धर्मों के प्रति वही लोग अत्यधिक सावधानी बरतते हैं। यदि वास्तव में धर्मनिरपेक्षता और समानता की बात करनी है तो सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान का भाव होना चाहिए। केवल एक धर्म को निशाना बनाना सामाजिक संतुलन को कमजोर करता है। इतिहास गवाह है कि सनातन धर्म किसी व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल पर आधारित नहीं है। यह हजारों वर्षों से प्रवाहित होती आध्यात्मिक धारा है। अनेक आक्रमण हुए, मंदिर तोड़े गए, संस्कृति को कमजोर करने के प्रयास हुए लेकिन सनातन हर बार और अधिक शक्ति के साथ खड़ा हुआ। क्योंकि इसकी जड़ें केवल परंपराओं में नहीं बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था और जीवन मूल्यों में हैं।
राजनीति में विचारों का संघर्ष स्वाभाविक है लेकिन वोट बैंक की राजनीति के लिए धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाना खतरनाक प्रवृत्ति है। नेताओं को समझना चाहिए कि वे केवल अपने समर्थकों के नहीं बल्कि पूरे समाज के प्रतिनिधि होते हैं। उनके शब्द समाज में एकता भी ला सकते हैं और विभाजन भी पैदा कर सकते हैं। इसलिए उन्हें संयम और जिम्मेदारी के साथ बोलना चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी धर्मों और परंपराओं के प्रति सम्मान की भावना रखी जाए। किसी भी धर्म की आलोचना करने से पहले उसके इतिहास, दर्शन और मानवता के लिए उसके योगदान को समझना आवश्यक है। सनातन धर्म ने विश्व को शांति, सहिष्णुता और मानवता का संदेश दिया है। जिस परंपरा ने विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” सिखाया उसे मिटाने की बातें केवल वैचारिक अहंकार हैं। सनातन कोई क्षणिक विचार नहीं बल्कि भारत की आत्मा है और यह धारा अनंत काल तक प्रवाहित होती रहेगी।