पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव विशेष रूप से अमरीका और ईरान के बीच टकराव ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिरता की ओर धकेल दिया है। इसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों परिवहन लागत और आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है और महंगाई का दबाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। हालिया आंकड़े बताते हैं कि मार्च 2026 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 3.4 प्रतिशत और थोक महंगाई दर 3.88 प्रतिशत तक पहुंच गई है जो पिछले कई महीनों का उच्च स्तर है। ईंधन बिजली गैस और रोजमर्रा की वस्तुओं के दाम बढ़ने से आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ा है। खासतौर पर पेट्रोकेमिकल आधारित उत्पादों के महंगे होने से उद्योगों की लागत बढ़ी है जिसका असर बाजार कीमतों में दिख रहा है।
स्थिति को और जटिल बनाने वाला एक बड़ा कारण मौसम से जुड़ी अनिश्चितता है। भारतीय मौसम विभाग ने अल नीनो के प्रभाव के चलते सामान्य से कम मॉनसून की आशंका जताई है। यदि ऐसा होता है तो दलहन और तिलहन जैसी फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है जिससे खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा है। वैश्विक स्तर पर भी भारत के लिए चेतावनी के संकेत मिल रहे हैं। मूडीज ने अपनी रिपोर्ट में भारत की विकास दर का अनुमान घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया है और महंगाई बढ़ने की आशंका जताई है। यह स्पष्ट करता है कि बाहरी कारक भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बना रहे हैं।
इन चुनौतियों के बीच सरकार ने कई मोर्चों पर सक्रियता दिखाई है। पेट्रोल डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती कर कीमतों को स्थिर रखने का प्रयास किया गया है। आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 को लागू कर जमाखोरी और कालाबाजारी पर नियंत्रण की दिशा में कदम उठाए गए हैं। साथ ही खाद्यान्न का पर्याप्त भंडार और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज उपलब्ध कराना बड़ी राहत साबित हो रहा है। ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में भी रणनीतिक बदलाव देखने को मिल रहे हैं। रूस और वेनेजुएला जैसे देशों से कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं ताकि वैश्विक बाजार की अस्थिरता का असर कम किया जा सके। इसके अलावा निर्यात शुल्क बढ़ाकर घरेलू उपलब्धता बनाए रखने की कोशिश भी की गई है। मौद्रिक मोर्चे पर भारतीय रिजर्व बैंक भी सतर्क है। आवश्यकता पड़ने पर रेपो रेट में बढ़ोतरी जैसे कदम उठाए जा सकते हैं ताकि महंगाई पर नियंत्रण रखा जा सके। हालांकि यह संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होगा क्योंकि सख्त मौद्रिक नीति से आर्थिक वृद्धि प्रभावित हो सकती है।
कुल मिलाकर यह समय बहुआयामी रणनीति का है जिसमें आपूर्ति प्रबंधन मूल्य नियंत्रण अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और मौद्रिक नीति सभी का संतुलित उपयोग आवश्यक है। भारत के पास मजबूत खाद्यान्न भंडार और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार जैसी ताकतें हैं जो इस चुनौतीपूर्ण दौर में सहारा दे सकती हैं। आवश्यक है कि सरकार तेजी और दृढ़ता के साथ सुधारात्मक कदम लागू करे ताकि वैश्विक संकट के बीच देश में महंगाई को नियंत्रित रखा जा सके और आम आदमी को राहत मिलती रहे।