अग्निकांड : हादसा नहीं, व्यवस्था के लिए चेतावनी

दिल्ली के मालवीय नगर स्थित एक होटल में हुए भीषण अग्निकांड ने एक बार फिर देश की शहरी सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया है। इस दर्दनाक घटना में कई लोगों की जान चली गई और अनेक लोग गंभीर रूप से घायल हुए। यह केवल एक आग लगने की घटना नहीं है, बल्कि उन खामियों का परिणाम है जो वर्षों से प्रशासनिक तंत्र, निगरानी व्यवस्था और सुरक्षा मानकों के पालन में मौजूद हैं। जब किसी होटल, अस्पताल, स्कूल, मॉल या व्यावसायिक भवन में आग लगती है, तो प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि आग कैसे लगी, बल्कि यह भी होना चाहिए कि आग को इतना भयावह रूप लेने की नौबत क्यों आई। यदि भवन में पर्याप्त अग्नि सुरक्षा उपकरण नहीं थे, आपातकालीन निकास मार्ग अवरुद्ध थे, क्षमता से अधिक लोगों को ठहराया गया था या सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई थी, तो यह केवल भवन संचालक की गलती नहीं बल्कि पूरे नियामक तंत्र की विफलता है। भारत पहले भी उपहार सिनेमा अग्निकांड, कुम्बाकोनम स्कूल हादसा, अमरी अस्पताल अग्निकांड और अनाज मंडी जैसी अनेक त्रासदियों का सामना कर चुका है। लगभग हर घटना की जांच में सुरक्षा नियमों के उल्लंघन, निरीक्षण में लापरवाही और जवाबदेही के अभाव की बात सामने आई। इसके बावजूद यदि हालात नहीं बदल रहे हैं तो यह चिंता का विषय है।

स्थानीय निकायों, अग्निशमन विभाग, पुलिस और आपदा प्रबंधन एजेंसियों की जिम्मेदारी केवल हादसे के बाद कार्रवाई करना नहीं बल्कि ऐसे जोखिमों को पहले ही पहचानकर रोकना भी है। नियमित निरीक्षण, प्रभावी फायर ऑडिट, मॉक ड्रिल और आधुनिक तकनीक का उपयोग आज समय की मांग है। दुर्भाग्य से कई स्थानों पर निरीक्षण केवल औपचारिकता बनकर रह गए हैं और नियमों का पालन कागजों तक सीमित दिखाई देता है। इस समस्या का एक गंभीर पक्ष भ्रष्टाचार भी है। यदि अवैध निर्माण, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और नियमों के उल्लंघन के बावजूद प्रतिष्ठान वर्षों तक संचालित होते रहें, तो यह स्पष्ट संकेत है कि कहीं न कहीं व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रही है। सुरक्षा प्रमाणपत्रों और निरीक्षण प्रक्रियाओं की पारदर्शिता सुनिश्चित करना आवश्यक है ताकि किसी भी प्रकार की अनियमितता को समय रहते रोका जा सके।

तेजी से बढ़ते शहरीकरण के दौर में सुरक्षा को विकास का अभिन्न हिस्सा बनाना होगा। केवल भवन निर्माण और व्यावसायिक विस्तार पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि नागरिकों के जीवन की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही आम लोगों को भी ऐसे प्रतिष्ठानों के प्रति सतर्क रहना होगा जहां सुरक्षा व्यवस्था संदिग्ध दिखाई दे। वास्तव में किसी भी अग्निकांड को केवल एक दुर्घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह उस पूरे प्रशासनिक, नियामक और सामाजिक तंत्र की परीक्षा होती है जो नागरिकों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। जब तक नियमित निरीक्षण, कठोर जवाबदेही, तकनीकी आधुनिकीकरण, संस्थागत समन्वय और भ्रष्टाचार के प्रति शून्य-सहिष्णुता की नीति को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसी त्रासदियां समय-समय पर मानव जीवन की भारी कीमत वसूलती रहेंगी। इन हादसों से सबक लेकर ठोस सुधार करना ही उन लोगों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी जिन्होंने ऐसी घटनाओं में अपने प्राण गंवाए हैं।