जंतर-मंतर पर पहरा और लोकतंत्र से जनता की बेदखली

लोकतंत्र की असली ताकत केवल चुनाव कराने और सरकार बनाने में नहीं बल्कि असहमति को सुनने और विरोध के अधिकार को सुरक्षित रखने में निहित होती है। जिस व्यवस्था में जनता अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर सके और सत्ता से सवाल पूछ सके वही व्यवस्था लोकतांत्रिक कहलाने की हकदार है। लेकिन जब विरोध की आवाज को लाठियों के बल पर दबाने और प्रदर्शनकारियों को राजधानी से दूर धकेलने की कोशिश होने लगे तो सवाल केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रह जाता बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद का बन जाता है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों को रोकने और वैकल्पिक प्रदर्शन स्थलों की व्यवस्था करने का विवाद इसी गंभीर सवाल को सामने लाता है। जंतर-मंतर लंबे समय से देश के जन आंदोलनों का प्रमुख केंद्र रहा है। संसद और केंद्रीय सत्ता के प्रमुख कार्यालयों के निकट स्थित यह स्थान जनता को अपनी आवाज सीधे सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने का अवसर देता रहा है। यहां धरना देने वाले किसान हों या छात्र संगठन या कर्मचारी अथवा राजनीतिक दलों से असहमत नागरिक सभी का उद्देश्य अपनी बात सरकार तक पहुंचाना होता है। ऐसे में जंतर-मंतर को प्रदर्शनकारियों के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र बना देना महज एक स्थान पर नियंत्रण स्थापित करना नहीं है बल्कि लोकतांत्रिक विरोध की परंपरा को सीमित करने जैसा है।

रामलीला मैदान बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी मैदान जैसे वैकल्पिक स्थलों की व्यवस्था अपने आप में अनुचित नहीं कही जा सकती। सार्वजनिक स्थलों पर प्रदर्शन के लिए वैकल्पिक स्थान निर्धारित करना प्रशासनिक जरूरत हो सकती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन स्थलों पर प्रदर्शन करने वालों की आवाज उतनी ही प्रभावी ढंग से सत्ता और आम जनता तक पहुंच सकेगी? लोकतंत्र में प्रदर्शन का अधिकार केवल कहीं भीड़ एकत्र करने तक सीमित नहीं है। उसका वास्तविक उद्देश्य अपनी समस्याओं और मांगों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाना है। यदि प्रदर्शन ऐसे स्थानों तक सीमित कर दिए जाएं जहां उनकी आवाज आम नागरिकों और निर्णय लेने वालों तक न पहुंचे तो इस अधिकार का व्यावहारिक महत्व कमजोर पड़ सकता है। सत्ता के लिए असहमति असुविधाजनक हो सकती है लेकिन लोकतंत्र में असुविधा को सहन करना ही उसकी सबसे बड़ी कसौटी है। सरकारें जनता के समर्थन से बनती हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि चुनाव जीतने के बाद उन्हें हर सवाल का जवाब देने से छूट मिल जाती है। विपक्ष का विरोध आलोचना और जन आंदोलनों के माध्यम से उठने वाले सवाल किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को जवाबदेह बनाते हैं। इन आवाजों को दबाने के बजाय उनके पीछे छिपी समस्याओं को समझना शासन की जिम्मेदारी होनी चाहिए।

जंतर-मंतर से जुड़े हालिया घटनाक्रम में प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारियों और पुलिस बल की व्यापक तैनाती को लेकर उठे सवाल भी गंभीर हैं। यदि किसी प्रदर्शन के दौरान हिंसा या कानून उल्लंघन की आशंका हो तो प्रशासन को आवश्यक कदम उठाने का अधिकार है। मगर यह अधिकार असीमित नहीं हो सकता। पुलिस की कार्रवाई आवश्यक अनुपात में होनी चाहिए और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है। किसी भी व्यक्ति के साथ हिरासत में दुर्व्यवहार या अपमानजनक व्यवहार की शिकायत सामने आए तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। कानून का शासन तभी विश्वसनीय बनता है जब उसका पालन कराने वाली संस्थाएं भी कानून और जवाबदेही के दायरे में रहें। इस पूरे प्रकरण का एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष मीडिया की स्वतंत्रता है। प्रदर्शन के दौरान पत्रकारों को कवरेज से रोकने या उनके साथ दुर्व्यवहार करने के आरोप यदि सही पाए जाते हैं तो यह केवल पत्रकारों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं बल्कि जनता के सूचना पाने के अधिकार पर भी चोट है। लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका घटनाओं को सामने लाने और सत्ता से जवाब मांगने की होती है। पुलिस कार्रवाई हो या प्रदर्शनकारियों का व्यवहार दोनों की निष्पक्ष रिपोर्टिंग आवश्यक है। इसी तरह किसी भी राजनीतिक या वैचारिक संगठन से जुड़े लोगों द्वारा प्रदर्शनकारियों पर हमले किए जाने की शिकायतों को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए। कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी पुलिस की है। यदि किसी समूह को हिंसा करने की छूट मिलती है और दूसरे समूह पर कार्रवाई होती है तो निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में राजनीतिक विचारधारा चाहे कोई भी हो हिंसा का अधिकार किसी को नहीं दिया जा सकता। दोषियों की पहचान और उनके विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई ही कानून के प्रति विश्वास कायम कर सकती है। दरअसल किसी भी सरकार की मजबूती इस बात से नहीं मापी जा सकती कि उसके विरोध में कितनी आवाजें उठने से रोक दी गईं। वास्तविक मजबूती इस बात में है कि सरकार आलोचना सुनने का कितना साहस रखती है और असहमति के बीच भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं को कितना सुरक्षित रखती है।