चुनाव आयोग में असहमति पर पारदर्शिता जरूरी

लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की प्रक्रिया का नाम नहीं है। उसकी असली मजबूती चुनावी व्यवस्था की पारदर्शिता निष्पक्षता और विश्वसनीयता से तय होती है। ऐसे में चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के भीतर उठने वाली असहमति को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। चुनाव आयोग के दो आयुक्तों की ओर से पिछले करीब दस महीनों में विभिन्न फैसलों और आदेशों पर 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज किए जाने की खबर ने इसी कारण गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बताई गई आपत्तियां केवल तकनीकी विषयों तक सीमित नहीं हैं। इनमें मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने फॉर्म-6 में बदलाव मतदाता आंकड़ों के केंद्रीकरण और चुनावी सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली तक अधिकारियों की पहुंच जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल बताए गए हैं। मतदाता सूची किसी सामान्य प्रशासनिक दस्तावेज की तरह नहीं है। इसी के आधार पर तय होता है कि चुनाव के दिन कौन नागरिक अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेगा। इसलिए सूची में किसी नाम का जुड़ना हटना या बहाल होना सीधे नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा प्रश्न है।

चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है। यदि इसके दो सदस्यों ने महत्वपूर्ण मामलों में बार-बार लिखित आपत्तियां दर्ज की हैं तो सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं है कि आयोग में अलग राय क्यों सामने आई। लोकतांत्रिक संस्थाओं में असहमति स्वाभाविक है और कई बार यही संस्थागत मजबूती का संकेत भी होती है। असली सवाल यह है कि इन आपत्तियों पर कितना विचार हुआ और अंतिम निर्णय तक पहुंचने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रही। फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता सूची के डिजिटल प्रबंधन को लेकर सामने आए सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। तकनीक चुनावी व्यवस्था को अधिक तेज और व्यवस्थित बना सकती है लेकिन तकनीकी प्रणाली लोकतांत्रिक निर्णय का विकल्प नहीं बन सकती। यदि कोई पात्र नागरिक दस्तावेजों की जांच में सही पाया जाता है लेकिन तकनीकी अड़चन के कारण उसका नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाता तो इसका सीधा असर उसके मताधिकार पर पड़ सकता है। इसलिए डिजिटल व्यवस्था में हर निर्णय का स्पष्ट और जांच योग्य रिकॉर्ड होना जरूरी है।

हालांकि चुनाव आयोग ने कथित आंतरिक मतभेद की व्याख्या को खारिज करते हुए कहा है कि नोटिंग टिप्पणियां सुझाव और अलग-अलग राय देना सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के अनुसार महत्वपूर्ण फैसले निर्धारित नियमों और विचार-विमर्श की प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं। इस पक्ष को भी ध्यान में रखना जरूरी है। केवल लिखित आपत्तियों की मौजूदगी को संस्था में निर्णायक विभाजन का प्रमाण नहीं माना जा सकता। लेकिन दूसरी ओर 14 लिखित आपत्तियों को पूरी तरह सामान्य टिप्पणी मानकर छोड़ देना भी उचित नहीं होगा। लोकतंत्र में संस्थाओं की विश्वसनीयता केवल उनके निर्णयों से नहीं बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया से भी बनती है। इसलिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि किन मुद्दों पर असहमति थी उन पर क्या विचार किया गया और अंतिम निर्णय किस आधार पर लिया गया। राजनीतिक दलों ने इस मामले को लेकर अलग-अलग आरोप और मांगें रखी हैं। इन राजनीतिक दावों का मूल्यांकन उपलब्ध दस्तावेजों और स्वतंत्र तथ्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। इस पूरे विवाद का केंद्र किसी व्यक्ति या दल को दोषी ठहराना नहीं बल्कि चुनावी व्यवस्था में जनता के विश्वास को बनाए रखना होना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि मतदाता सूची में होने वाले महत्वपूर्ण बदलावों का स्पष्ट ऑडिट रिकॉर्ड उपलब्ध हो। किस अधिकारी ने क्या निर्णय लिया किस आधार पर लिया किस स्तर पर उसमें बदलाव हुआ और डिजिटल प्रणाली ने उसे किस तरह दर्ज किया इन सवालों के जवाब स्पष्ट होने चाहिए। साथ ही आयोग के भीतर दर्ज असहमति के निस्तारण की प्रक्रिया भी पारदर्शी होनी चाहिए। चुनाव तभी लोकतंत्र का वास्तविक उत्सव बन सकता है जब प्रत्येक पात्र नागरिक को यह भरोसा हो कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित है और उसके मताधिकार पर किसी तकनीकी या प्रशासनिक अस्पष्टता का असर नहीं पड़ेगा। असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं है। असहमति को सुनना उस पर विचार करना और उसके समाधान को पारदर्शी बनाना ही लोकतांत्रिक संस्थाओं की असली कसौटी है।