पंडित अमित भारद्वाज
श्राद्ध पक्ष अर्थात् पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का पर्व पितृ पक्ष पूर्णिमा 26 सितंबर से प्रारम्भ होकर सर्व पितृ अमावस्या 10 अक्टूबर पर्यंत रहेगा। इस बार पितृ पक्ष 16 दिन के बजाय 15 दिन रहेगा। इसमें इस बार एक दिन घट रहा है। पंचमी व षष्ठी का श्राद्ध एक ही दिन यानि 1 अक्टूबर को होगा। बाकी सभी श्राद्ध क्रम से होंगे। पंडित अमित भारद्वाज ने बताया कि मनु द्वारा प्रारंभ की गई श्राद्ध की परंपरा का प्रमुख तत्व श्रद्धा है। जिसमें अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा नहीं वह श्राद्ध करने का अधिकारी नहीं होता। यह पितृ ऋण चुकाने की एक प्रक्रिया है।
इसमें पुरुखों के प्रति कृतज्ञता का भाव होता है। जिसके पितृ संतुष्ट नहीं होते उनका देवता भी भला नहीं करते। महर्षि जाबालि, कार्ष्णाजिनी, वेद व्यास आदि द्वारा एवं कूर्म पुराण, गरुण पुराण में उल्लिखित है कि जो व्यक्ति श्राद्ध करके अपने पितरों को संतुष्ट करता है वह आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य व इच्छित वस्तुएं प्राप्त करता है । अपनी संतति के द्वारा श्राद्ध न पाने पर निराश होकर दीर्घ स्वांस लेते हुए गृहस्थ को दारुण दुख का श्राप देकर पितृ लोक वापस चले जाते है। व्यक्ति को अपनी तीन पीढ़ियों का श्राद्घ करना चाहिए। तीन पीढ़ियों के तीन पूर्वज पिता , पितामह प्रपितामह क्रमशः वसु, रुद्र ,आदित्य तुल्य माने गए है। । सूक्ष्म शरीर में आए हुए पितृ श्राद्ध में अर्पित द्रव्य वायु रूप में प्रविष्ट होकर उन्हें प्राप्त होते हैं। श्राद्ध प्रयुक्त द्रव्य तिल, उड़द, जौ, चावल, जल, कंदमूल, फल, व घृत हैं। पक्ष भर प्रतिदिन गौ ग्रास निकालना चाहिए श्राद्ध की तिथि के दिन गौ ग्रास के अलावा कौआ, कुत्ता व जलचरों के लिए ग्रास निकाल कर सात्विक ब्राह्मण को श्रद्धा के साथ भोजन करा अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा वस्त्र उपहार प्रदान करना चाहिए। प्रतिदिन गौ ग्रास के बाद एवं श्राद्ध तिथि के दिन ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद किसी आचार्य के निर्देशन में तर्पण अर्थात् जलदान अवश्य करना चाहिए। इस पक्ष में दिन में सोना, असत्य भाषण, रतिक्रिया , हजामत बनवाना, शरीर पर तेल साबुन इत्र लगाना, मदिरापान, अनैतिक कृत्य, वाद विवाद एवं किसी भी जीवधारी को हानि या कष्ट पहुंचाना निषेध है।
उल्लिखित है कि श्राद्ध हमेशा अपनी सामर्थ्य के अनुसार लेकिन श्रद्धा से कराना चाहिए। गरीब व्यक्ति के लिए भी श्राद्ध का विधान बतलाया गया हैं कि वह कंदमूल फल से या कुछ भी न हो तो तिल युक्त जल से तिलांजलि देकर भी अपने कर्तव्य की पूर्ति कर सकता है। अगर यह भी न हो तो दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पितरों को श्रद्धा के साथ हाथ जोड़कर स्मरण करे तो उससे भी पितृ संतुष्ट व तृप्त होते है । श्राद्ध अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही करना चाहिये। लेकिन श्रद्धा परम आवश्यक हैं। —