मथुरा के आयुष गर्ग का वैश्विक मंचों पर परचम, एआई से युवाओं को सशक्त बनाने का संकल्प

1 करोड़ युवाओं को एआई प्रशिक्षण की मुहिम से जुड़े

नई दिल्ली। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के क्षेत्र में तेजी से उभरते भारत के लिए मथुरा के युवा विशेषज्ञ आयुष गर्ग वैश्विक स्तर पर पहचान बना रहे हैं। नासा, जी-20, संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीयू) जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर अपने विचार रख चुके आयुष गर्ग अब देश के युवाओं को जिम्मेदार एआई से जोड़ने के मिशन में जुटे हैं।
स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देश के 1 करोड़ युवाओं को एआई के लिए प्रशिक्षित करने की घोषणा के बाद इस दिशा में गतिविधियां तेज हुई हैं। इसी क्रम में आयुष गर्ग विभिन्न राष्ट्रीय संस्थानों के साथ मिलकर युवाओं को एआई की शिक्षा और प्रशिक्षण देने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
मथुरा में जन्मे आयुष गर्ग, भूतेश्वर रोड स्थित सागर कॉम्प्लेक्स निवासी प्रभुदयाल कसेरे के प्रपौत्र और अनुज गर्ग के पुत्र हैं। वह ग्लोबल यूथ एआई एडवाइजरी बॉडी के अध्यक्ष हैं, जिसमें 50 देशों के विशेषज्ञ शामिल हैं, साथ ही दिल्ली स्कूल ऑफ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के संस्थापक भी हैं। उनका उद्देश्य एआई को केवल विशेषज्ञों तक सीमित न रखकर आम लोगों, छात्रों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं तक सरल रूप में पहुंचाना है। आयुष गर्ग भारतीय संसद से जुड़े मंचों, भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई), दुबई इंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर (डीआईएफसी), टाइम्स ऑफ इंडिया और दैनिक जागरण जैसे संस्थानों के साथ मिलकर भी युवाओं को एआई प्रशिक्षण दे रहे हैं।
रक्षा क्षेत्र में एआई अनुसंधान के लिए उन्हें रक्षा मंत्रालय द्वारा स्वर्ण पदक से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी पुस्तक “न्यूक्लियर वाटर्स: डिटेक्शन ऑफ सबमरीन यूजिंग एआई” को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली है, जिसमें समुद्री सुरक्षा में एआई के उपयोग को दर्शाया गया है।
आयुष गर्ग ने सेंट स्टीफेंस कॉलेज दिल्ली, मद्रास यूनिवर्सिटी, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, हार्वर्ड और ऑक्सफोर्ड जैसे विश्वस्तरीय संस्थानों से अध्ययन एवं प्रशिक्षण प्राप्त किया है। वर्तमान में वह वैश्विक स्तर पर युवाओं को एआई, साइबर सुरक्षा और भू-राजनीति जैसे विषयों में प्रशिक्षित कर रहे हैं।

आयुष का कहना है कि अब उनका समूह एआई उपयोग के लिए एक वैश्विक चार्टर तैयार कर रहा है, जिसे जल्द जारी किया जाएगा। उनका मानना है कि भारत में एआई का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब इसे छोटे शहरों, स्कूलों, युवाओं और आम नागरिकों तक पहुंचाया जाए।