नई दिल्ली । भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय की एक मिसाल पेश करते हुए तीन दशकों से चल रहे एक लंबे कानूनी संघर्ष का अंत कर दिया है। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए एक बुजुर्ग दंपती के बीच चल रहे मामले के साथ कुल 61 मुकदमों को एक झटके में रद्द कर दिया और उन्हें तलाक की मंजूरी दे दी। साल 1994 से चले आ रहे इस विवाद में पति और पत्नी के बीच देश की विभिन्न अदालतों में घरेलू हिंसा, संपत्ति विवाद और मानहानि जैसे दर्जनों मामले लंबित थे। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने यह महत्वपूर्ण आदेश देते हुए स्पष्ट किया कि जब किसी वैवाहिक रिश्ते में सुधार की कोई गुंजाइश न बचे और वह पूरी तरह टूट चुका हो, तो उसे खींचने के बजाय स्थाई रूप से समाप्त करना ही न्यायसंगत है।
यह मामला मूल रूप से अवमानना याचिका के रूप में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था लेकिन सुनवाई के दौरान पीठ ने पाया कि दोनों पक्ष पिछले 30 वर्षों से केवल कानूनी दांव-पेंच में उलझे हुए हैं। कोर्ट ने पहले दोनों पक्षों की काउंसलिंग करवाई और उन्हें आपसी सहमति से अलग होने के लिए प्रेरित किया। लंबी बातचीत के बाद, पति अपनी पत्नी को स्थाई भरण-पोषण (एलिमनी) के रूप में एक करोड़ रुपये की एकमुश्त राशि देने पर सहमत हुआ। इसके अतिरिक्त, लोनावला स्थित एक संपत्ति में पत्नी के हिस्से के बदले 90 लाख रुपये अलग से जमा करने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने संपत्ति के बंटवारे और वित्तीय लेनदेन को लिखित रूप में दर्ज करने के बाद ही इस समझौते पर अपनी मुहर लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले के जरिए ट्रायल कोर्ट, हाई कोर्ट और स्वयं सुप्रीम कोर्ट में लंबित सभी 61 दीवानी और आपराधिक मामलों को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया। अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि भविष्य में किसी भी पक्ष द्वारा उन्हीं पुराने मुद्दों पर कोई नया केस दर्ज नहीं किया जा सकेगा। पीठ ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 142 का उपयोग पूर्ण न्याय करने के लिए किया गया है ताकि पक्षकारों को कानूनी बाधाओं से मुक्त किया जा सके। दोनों पक्षों ने अदालत के समक्ष सहमति दी कि वे अब कोई कानूनी लड़ाई नहीं लड़ना चाहते हैं और भविष्य में शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करेंगे। यह फैसला अदालतों में लंबित वर्षों पुराने मुकदमों के निपटारे के लिए एक प्रभावी मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगा।
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