मथुरा। प्रकांड विद्वान महाराज दशानन ब्राह्मण थे। भगवान श्री राम के आचार्य थे। उन्होंने भगवान भोलेनाथ के निर्देशों पर वेदों को संगीतमय किया था। तप बल के आधार पर वो त्रिकाल दर्शी थे।और महादेव के अनन्य भक्त थे। ऐसे विद्वान ब्राह्मण का जो लोग प्रति वर्ष पुतला दहन करते वो ब्रह्म्म हत्या के दोषी होते है ।
लंकेश भक्त मंडल के अध्यक्ष ओमवीर सारस्वत एडवोकेट का दावा है कि महाराज दशानन प्रकांड विद्वान ब्राह्मण थे। भगवान भोलेनाथ ने रावण की विद्वता को देखकर वेदों को संगीतमय मय रावण से कराया था। रावण को चारो वेदों और छह शास्त्रों का सम्पूर्ण ज्ञान था । चारो वेद और छह शास्त्र रावण के दस सीस के रूप में जाने जाते थे। इसके चलते भी रावण का नाम दशानन पड़ गया था। महाराज रावण महाबली थे जिन्होंने तप वल से शक्ति अर्जित की थी। इन्हीं शक्तियों से उन्होंने तीनों लोकों को जीत लिया था जिससे वो त्रिलोक विजेता भी वन गए थे। लंकेश को वर्तमान भविष्य और भूतकाल का ज्ञान था। रावण के पास इतनी शक्तियां थी कि उनके राज्य में काल भी कोई अनहोनी घटना नहीं करता था। तप बल से रावण ने अनेक मायावी शक्तियां अर्जित की थी। ऐसे महाप्रतापी शिव भक्त का पुतला दहन करना घोर पाप की श्रेणी में आता है। विद्वता के आधार पर ही भगवान श्री राम ने लंका विजय के लिए लंकेश से भगवान भोलेनाथ की स्थापना कराई थी और राम जी ने रावण को अपना आचार्य माना था। यहां रावण ने स्वः लंका पर विजय प्राप्त करने का आशीर्वाद अपने यजमान भगवान श्री राम को दिया था। लंका पर विजय प्राप्त हो जाने के बाद भगवान श्री राम ने अयोध्या में जाकर व्रह्म्म हत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए अनेक धार्मिक उपाय किए थे। रावण के पुतला बनाने के कार्य को इसीलिए हिंदू कम करते हैं क्योंकि उन्हें ब्रह्म्म हत्या के दोष का डर लगता है। पुतला के रूप में विद्वान ब्राह्मण को जलाना घोर पाप होता है। भगवान श्री राम के आचार्य का पुतला दहन करना सनातन धर्म के प्रतिकूल है। ब्रह्म्म्म हत्या जैसे घोर पाप से बचने के लिए हमे पुतला दहन नहीं करना चाहिए।
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