मथुरा । विजयादशमी पर जहां शहर में रावण दहन की तैयारियां चलती रहीं, वहीं यमुना किनारे स्थित जयश्री लंकेश मंदिर में सारस्वत समाज के लोगों ने रावण (लंकेश) की विशेष पूजा-अर्चना कर पुतला दहन की परंपरा का विरोध जताया। समाज के श्रद्धालुओं ने रावण को प्रकांड विद्वान बताते हुए कहा कि उनके व्यक्तित्व के विद्वता और धार्मिक पक्ष को भी समझने की आवश्यकता है। लंकेश भक्त मंडल के संरक्षक ओमवीर सारस्वत ने कहा कि रावण दहन की परंपरा वर्षों से चली आ रही है, लेकिन हर साल पुतले जलाने के बावजूद समाज में बुराइयां समाप्त नहीं हो रही हैं। उनका कहना है कि प्रतीकात्मक रूप से रावण का पुतला जलाने के बजाय लोगों को अपने भीतर मौजूद अहंकार, क्रोध, लोभ और अन्य बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प लेना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रावण प्रकांड विद्वान होने के साथ भगवान श्रीराम के आचार्य भी थे। ऐसे में रावण के पुतला दहन की परंपरा पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि रावण वध का मंचन रामलीलाओं तक सीमित रखा जाए और जगह-जगह पुतला दहन करने पर रोक लगाई जाए।
विजयादशमी के अवसर पर जयश्री लंकेश मंदिर में हुई विशेष पूजा-अर्चना के माध्यम से सारस्वत समाज के लोगों ने रावण के विद्वान स्वरूप के प्रति अपनी आस्था और मान्यताओं को व्यक्त किया। समाज के लोगों का कहना है कि दशहरा पर्व पर बुराइयों के अंत का संदेश आत्मसात करना अधिक महत्वपूर्ण है, ताकि यह पर्व केवल प्रतीकात्मक आयोजन न रहकर जीवन में सकारात्मक बदलाव का माध्यम बन सके।