हर साल विजयादशमी पर रावण के विशाल पुतले धू-धू कर जलते हैं। आतिशबाजी की चमक और पटाखों की गूंज के बीच बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है। कुछ ही मिनटों में रावण का पुतला राख हो जाता है और लोग एक-दूसरे को विजयादशमी की शुभकामनाएं देकर घर लौट जाते हैं। लेकिन इस उत्सव के बीच एक सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि यदि हर साल रावण जल रहा है, तो समाज में बुराइयां कम होने के बजाय लगातार क्यों बढ़ रही हैं? आखिर वह कौन-सा रावण है, जो हर साल जलने के बाद भी नए रूप में हमारे सामने खड़ा हो जाता है? दरअसल, दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्ममंथन, नैतिक चेतना और सामाजिक जिम्मेदारी का अवसर है। रावण दहन का मूल संदेश अहंकार, अन्याय, छल, लोभ और अनैतिकता के अंत से जुड़ा है। विडंबना यह है कि हमने इस संदेश को एक वार्षिक आयोजन तक सीमित कर दिया है। पुतलों का आकार बढ़ रहा है, आयोजनों की भव्यता बढ़ रही है और उत्सव पर खर्च भी बढ़ रहा है, लेकिन क्या हमारे सामाजिक चरित्र में भी उतना ही सुधार दिखाई दे रहा है? यदि नहीं, तो हमें अपनी उत्सवधर्मिता के साथ-साथ अपनी सोच और आचरण की भी समीक्षा करनी होगी। रामायण का रावण विद्वान था, शक्तिशाली था और शिवभक्त भी था। उसके पास ज्ञान, सामर्थ्य और वैभव की कोई कमी नहीं थी, लेकिन अहंकार और अधर्म ने उसकी समस्त उपलब्धियों को निरर्थक बना दिया। पराई स्त्री का अपहरण और अपनी शक्ति के मद में मर्यादा का उल्लंघन उसके पतन का कारण बना। रावण का अंत हमें यही सिखाता है कि केवल विद्वत्ता, प्रतिष्ठा और शक्ति किसी व्यक्ति को महान नहीं बनातीं। महानता का वास्तविक आधार चरित्र, संयम, न्याय और दूसरों के अधिकारों के प्रति सम्मान है। जब ज्ञान के साथ विवेक और शक्ति के साथ मर्यादा समाप्त हो जाती है, तब पतन की शुरुआत हो जाती है।
आज का रावण किसी एक व्यक्ति या चेहरे तक सीमित नहीं है। वह उस मानसिकता में जीवित है, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के अधिकारों का हनन करती है। जब किसी बेटी की अस्मिता पर हमला होता है, जब दहेज के लिए किसी बहू को प्रताड़ित किया जाता है, जब रिश्वत के जरिए न्याय और अधिकारों का सौदा होता है, जब नशा परिवारों को बर्बाद करता है और जब लालच रिश्तों की संवेदनाओं पर भारी पड़ जाता है, तब रावण के जीवित होने का प्रमाण किसी पुतले में नहीं, बल्कि हमारे समाज में दिखाई देता है। भ्रष्टाचार, हिंसा, शोषण और संवेदनहीनता के विरुद्ध केवल चिंता जताना पर्याप्त नहीं है। इनके खिलाफ व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर प्रभावी कदम उठाना भी आवश्यक है। समाज की एक बड़ी विडंबना यह है कि हम दूसरों की बुराइयां देखने में जितने सजग हैं, अपने भीतर झांकने में उतने ही कमजोर साबित होते हैं। दूसरों का अहंकार हमें तुरंत दिखाई देता है, लेकिन अपना अहंकार स्वाभिमान लगने लगता है। दूसरे का स्वार्थ हमें गलत लगता है, लेकिन अपने हित में किया गया नैतिक समझौता व्यावहारिकता कहलाता है। दूसरों की गलतियों पर कठोर टिप्पणी करने वाले लोग कई बार अपनी भूलों के लिए बहाने तलाशते नजर आते हैं। यही दोहरा चरित्र हमारी नैतिक चेतना को कमजोर करता है। जब तक हम अपनी कमियों को स्वीकार करने का साहस नहीं जुटाएंगे, तब तक भीतर के रावण का अंत संभव नहीं है। दशहरे की सार्थकता केवल धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने से पूरी नहीं होती। राम के आदर्शों की चर्चा करना आसान है, लेकिन सत्य के पक्ष में खड़े होना, न्याय के लिए अपने स्वार्थ का त्याग करना और विपरीत परिस्थितियों में भी मर्यादा बनाए रखना कठिन है। धर्म का वास्तविक मूल्य बाहरी प्रदर्शन से नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार से तय होता है। यदि कोई व्यक्ति मंदिर में पूजा-अर्चना करके लौटने के बाद अपने परिवार के साथ दुर्व्यवहार करता है, कार्यस्थल पर बेईमानी करता है या किसी कमजोर व्यक्ति का शोषण करता है, तो उसे अपने आचरण पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। आस्था तभी सार्थक है, जब वह मनुष्य को अधिक संवेदनशील, न्यायप्रिय और जिम्मेदार बनाए। सामाजिक बुराइयों को समाप्त करने की जिम्मेदारी केवल सरकार या प्रशासन की नहीं है। परिवार, विद्यालय, सामाजिक संस्थाओं और प्रत्येक नागरिक की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। बच्चों को ईमानदारी, समानता, संवेदनशीलता और सम्मान का पाठ केवल पढ़ाया ही न जाए, बल्कि उन्हें अपने बड़ों के व्यवहार में इन मूल्यों का उदाहरण भी दिखाई देना चाहिए। महिलाओं के प्रति सम्मान, कमजोरों के अधिकारों की रक्षा, भ्रष्टाचार का विरोध और नशे जैसी समस्याओं के विरुद्ध जागरूकता समाज की सामूहिक प्राथमिकता बननी चाहिए। कानून का प्रभावी क्रियान्वयन जरूरी है, लेकिन उसके साथ नागरिकों में नैतिक जिम्मेदारी का विकास भी उतना ही आवश्यक है।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि रावण का पुतला कितना ऊंचा बनाया गया, बल्कि इस बात की है कि हमारा चरित्र कितना ऊंचा है। आतिशबाजी की आवाज कितनी तेज रही, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अन्याय के विरुद्ध हमारी आवाज कितनी बुलंद है। पुतले की ऊंचाई कुछ घंटों में समाप्त हो जाती है, लेकिन चरित्र की ऊंचाई पीढ़ियों को दिशा दे सकती है। उत्सव की वास्तविक सफलता तभी है, जब उसका संदेश हमारे जीवन में उतर सके। इस विजयादशमी पर हमें संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने भीतर की कम से कम एक बुराई को पहचानकर उसे दूर करने का प्रयास करेंगे।