संयुक्त राष्ट्र की साख पर सवाल

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का उद्देश्य विश्व में शांति, सुरक्षा, समानता और मानवाधिकारों की रक्षा करना था। दुनिया के देशों के बीच विवादों को सुलझाने और कमजोर राष्ट्रों को न्याय दिलाने के लिए इस संस्था से बड़ी उम्मीदें जुड़ी रही हैं। लेकिन बदलते वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र की निष्पक्षता, प्रभावशीलता और विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि कई बार उसकी सक्रियता देशों की राजनीतिक परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन से प्रभावित दिखाई देती है। यदि किसी संस्था के फैसलों और टिप्पणियों में समानता का अभाव नजर आने लगे, तो उसकी साख पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। भारत और संयुक्त राष्ट्र के बीच हालिया विवाद इसी व्यापक बहस का हिस्सा है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में विशेष प्रतिवेदक जीना रोमेरो की रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति जताई। रिपोर्ट में भारत में मानसिक स्वास्थ्य और लैंगिक न्याय जैसे विषयों पर आवाज उठाने वाले युवाओं को कथित प्रताड़ना तथा सामाजिक कलंक का सामना करने की बात कही गई थी। भारत के स्थायी मिशन के प्रथम सचिव अनुज स्वरूप ने इन आरोपों को खारिज करते हुए उनके आधार और स्रोतों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। भारत का तर्क है कि किसी देश और उसके समाज के बारे में व्यापक निष्कर्ष निकालने से पहले तथ्यों का सत्यापन और संबंधित पक्षों का दृष्टिकोण समझना आवश्यक है।

यह तर्क केवल भारत की आपत्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की जवाबदेही से भी जुड़ा है। मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए काम करने वाली संस्थाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने निष्कर्षों के पीछे मौजूद तथ्यों और पद्धति को स्पष्ट करें। गुमनाम स्रोतों से प्राप्त जानकारी भी जांच का आधार बन सकती है, लेकिन उसके सत्यापन, विश्वसनीयता और सीमाओं को स्पष्ट करना जरूरी है। किसी रिपोर्ट की आलोचना का उत्तर तथ्यों से दिया जाना चाहिए और रिपोर्ट तैयार करने वाली संस्था को भी पारदर्शिता के मानकों पर खरा उतरना चाहिए। नागरिकता संशोधन कानून, तीन कृषि कानूनों के विरोध में हुए आंदोलन और जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने जैसे विषयों पर भारत तथा संयुक्त राष्ट्र से जुड़े निकायों के बीच पहले भी मतभेद सामने आ चुके हैं। भारत इन मामलों को अपनी विधायी, न्यायिक और संवैधानिक व्यवस्था के दायरे में आने वाला विषय मानता रहा है। वहीं, मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र के कुछ विशेषज्ञों ने नागरिक स्वतंत्रताओं, विरोध प्रदर्शनों तथा हिरासत से जुड़े सवाल उठाए हैं। इन मतभेदों को केवल बाहरी हस्तक्षेप या केवल मानवाधिकारों की चिंता कहकर खारिज करना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता इस बात की है कि हर मामले का आकलन तथ्यों, कानून और स्थापित मानकों के आधार पर किया जाए।

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहां संसद, न्यायपालिका, निर्वाचन व्यवस्था और स्वतंत्र मीडिया जैसी संस्थाएं सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। लोकतंत्र की मजबूती का अर्थ केवल अपनी संस्थाओं पर विश्वास करना नहीं, बल्कि उनकी जवाबदेही और पारदर्शिता को निरंतर मजबूत बनाए रखना भी है। इसी तरह किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था की आलोचना करना भारत का अधिकार है, लेकिन मानवाधिकारों से संबंधित प्रत्येक सवाल को देश की संप्रभुता के विरुद्ध मान लेना भी उचित नहीं होगा। संप्रभुता और मानवाधिकार परस्पर विरोधी अवधारणाएं नहीं हैं। एक जिम्मेदार लोकतंत्र दोनों की रक्षा करते हुए आगे बढ़ता है। उमर खालिद, शरजील इमाम और अफजल गुरु जैसे विवादित मामलों को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते रहे हैं। इन मामलों में आरोपों, न्यायिक प्रक्रिया, हिरासत और निष्पक्ष सुनवाई से जुड़े प्रश्नों का मूल्यांकन संबंधित तथ्यों तथा न्यायालयों के निर्णयों के आधार पर होना चाहिए। किसी आरोपी के पक्ष या विरोध में राजनीतिक धारणा बना लेना न्याय का विकल्प नहीं हो सकता। अदालतों की स्वतंत्रता का सम्मान जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि कानूनी प्रक्रिया में निष्पक्ष सुनवाई और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो।

संयुक्त राष्ट्र के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपनी विश्वसनीयता को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाए। दुनिया के किसी भी हिस्से में मानवाधिकारों का उल्लंघन हो, उसकी जांच समान मानकों पर होनी चाहिए। आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता, अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा और नागरिक स्वतंत्रताओं के हनन जैसे मुद्दों पर चयनात्मक प्रतिक्रिया संस्था की निष्पक्षता को कमजोर करती है। भारत की शिकायत हो या किसी अन्य देश की, संयुक्त राष्ट्र को उसका उत्तर स्पष्ट तथ्यों और पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से देना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की ताकत उनके अधिकारों से अधिक उनकी निष्पक्षता और नैतिक विश्वसनीयता में होती है। यदि शक्तिशाली देशों के मामलों में नरमी और अन्य देशों के मामलों में कठोरता दिखाई दे, तो वैश्विक विश्वास कमजोर होना तय है।