बांग्लादेश का बदलता रुख भारत के लिए नई रणनीतिक चुनौती

दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति भारत के सामने अब एक ऐसी चुनौती खड़ी कर रही है जिसे केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों के पुराने चश्मे से नहीं देखा जा सकता। बांग्लादेश का सऊदी अरब तुर्की और पाकिस्तान के बीच बने नए रक्षा ढांचे में शामिल होने के विकल्प को लेकर खुला रुख इस बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत है। ढाका का यह कहना कि वह अपने हितों को ध्यान में रखते हुए इस विकल्प पर विचार करेगा महज कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि बांग्लादेश अपनी विदेश और सुरक्षा नीति में नए विकल्प तलाश रहा है। सऊदी अरब तुर्की और पाकिस्तान के बीच हुए रक्षा समझौते में एक देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा। यह व्यवस्था नाटो के अनुच्छेद 5 जैसी दिखाई देती है लेकिन दोनों व्यवस्थाओं के बीच जमीन आसमान का अंतर है। नाटो के पीछे दशकों की संस्थागत व्यवस्था साझा सैन्य अभ्यास एकीकृत कमान और आपसी विश्वास है। इसके विपरीत नए रक्षा समूह के सदस्य देशों की सुरक्षा प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। सऊदी अरब की प्रमुख चिंता ईरान है। पाकिस्तान का रणनीतिक ध्यान भारत पर केंद्रित है जबकि तुर्की की अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं और पूर्वी भूमध्यसागर से जुड़े हित हैं।

फिर भी भारत के लिए इस घटनाक्रम को हल्के में लेना बड़ी रणनीतिक भूल होगी। बांग्लादेश में पिछले दो वर्षों में तुर्की और पाकिस्तान की सक्रियता बढ़ी है। सैन्य सहयोग प्रशिक्षण और रक्षा उपकरणों से जुड़े रिश्ते इस बदलाव को और गंभीर बनाते हैं। तुर्की का बांग्लादेश के साथ बढ़ता रक्षा संबंध यह बताता है कि अंकारा अब दक्षिण एशिया में केवल दूर का बाहरी खिलाड़ी नहीं रहना चाहता। वह भारत के पूर्वी पड़ोस में अपनी रणनीतिक मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू भूगोल है। पाकिस्तान भारत के पश्चिम में है और उसके साथ मुकाबले तथा तनाव का भारत को दशकों का अनुभव है। बांग्लादेश की स्थिति अलग है। वह भारत के पूर्वी हिस्से से जुड़ा हुआ है और पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा तथा संपर्क व्यवस्था में उसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत का चिकन नेक यानी सिलीगुड़ी कॉरिडोर देश के पूर्वोत्तर को शेष भारत से जोड़ने वाला बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। ऐसे में ढाका की विदेश नीति में किसी बड़े बदलाव का सीधा असर भारत की रणनीतिक गणनाओं पर पड़ सकता है। शेख हसीना के लंबे शासनकाल के दौरान भारत और बांग्लादेश के संबंधों में जिस स्थिरता की तस्वीर बनी थी अगस्त 2024 में सत्ता परिवर्तन के बाद वह आधार कमजोर हुआ है। भारत ने लंबे समय तक यह मानकर अपनी पूर्वी रणनीति बनाई कि ढाका उसके साथ सहयोग करता रहेगा। अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार विभिन्न देशों के साथ नए संबंधों की संभावनाएं तलाश रही है और यही भारत के लिए सबसे बड़ी चेतावनी है। हालांकि भारत को इस घटनाक्रम पर जल्दबाजी में आक्रामक प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए। कूटनीति में हर चुनौती का जवाब सार्वजनिक बयानबाजी से देना जरूरी नहीं होता। यदि भारत अत्यधिक प्रतिक्रिया देता है तो इसका फायदा वही ताकतें उठा सकती हैं जो भारत के खिलाफ घेराबंदी का माहौल बनाने में जुटी हैं।

सबसे पहले भारत को बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के साथ लगातार संवाद बनाए रखना होगा। आगामी राजनीतिक बदलावों का इंतजार करते हुए कूटनीतिक दूरी बनाना भारत के हित में नहीं होगा। ढाका के साथ संवाद जितना मजबूत रहेगा उतना ही भारत के पास बदलते समीकरणों को प्रभावित करने की गुंजाइश बनी रहेगी। इसके साथ ही भारत को खाड़ी देशों के साथ अपने सुरक्षा संबंधों को भी नए सिरे से मजबूत करना होगा। भारत की पश्चिम एशिया नीति लंबे समय से आर्थिक संबंधों ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों के हितों पर केंद्रित रही है। सऊदी अरब यूएई और अन्य खाड़ी देशों के साथ भारत को सुरक्षा सहयोग के नए आयाम विकसित करने होंगे। तुर्की को भी भारत को केवल पाकिस्तान के सहयोगी के रूप में देखने की पुरानी नीति से आगे बढ़कर समझना होगा। अंकारा की अपनी स्वतंत्र क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं हैं। वह पश्चिम एशिया से लेकर मध्य एशिया और दक्षिण एशिया तक अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है। भारत के लिए जरूरी है कि वह तुर्की की इस रणनीति का शांत दिमाग से आकलन करे और उसके प्रभाव को केवल भारत विरोधी गतिविधियों के चश्मे से न देखे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत को संभावित परिस्थितियों के लिए पहले से तैयारी करनी होगी। यदि बांग्लादेश औपचारिक रूप से नए रक्षा ढांचे में शामिल होता है यदि तुर्की की सैन्य आपूर्ति और बढ़ती है या यदि पाकिस्तान की सैन्य मौजूदगी बांग्लादेश में स्थायी रूप लेती है तो भारत की पूर्वी सुरक्षा व्यवस्था पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। इन सवालों के जवाब आज से तलाशने होंगे। भारत की पड़ोस नीति के लिए यह घटनाक्रम एक बड़े सबक की तरह है। लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि भौगोलिक निकटता आर्थिक निर्भरता और ऐतिहासिक संबंध पड़ोसी देशों को भारत के स्वाभाविक प्रभाव क्षेत्र में बनाए रखेंगे। लेकिन बदलती दुनिया में छोटे और मध्यम देश भी अपने लिए कई विकल्प तलाश रहे हैं। तुर्की पाकिस्तान चीन और खाड़ी देशों के साथ संबंध बनाकर वे भारत पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं। इसलिए बांग्लादेश का बदलता रुख केवल ढाका की विदेश नीति का मामला नहीं है। यह भारत की पड़ोस नीति की परीक्षा है।