कश्मीर पर बदली कूटनीतिक तस्वीर

जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच दशकों से चले आ रहे विवाद के बीच अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का यह कहना कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत है। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात के बाद अमेरिकी राजदूत की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब पाकिस्तान लगातार कश्मीर के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने का प्रयास कर रहा है। इसलिए इस बयान का राजनीतिक और कूटनीतिक महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय विवाद के रूप में पेश करना पाकिस्तान की विदेश नीति का पुराना हिस्सा रहा है। पाकिस्तान का राजनीतिक नेतृत्व समय-समय पर कश्मीर का मुद्दा उठाकर घरेलू राजनीति में भी इसका इस्तेमाल करता रहा है। लेकिन बदलते वैश्विक समीकरणों में केवल कश्मीर का नाम लेकर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना अब पहले जितना आसान नहीं रह गया है। दुनिया की प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं और बड़ी शक्तियां अब क्षेत्रीय स्थिरता आतंकवाद आर्थिक हित और रणनीतिक साझेदारी को अधिक महत्व देती हैं।

भारत और अमेरिका के संबंधों में पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह विस्तार हुआ है उसने भी इस बदलती तस्वीर को आकार दिया है। रक्षा तकनीक व्यापार ऊर्जा अंतरिक्ष और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में दोनों देशों का सहयोग लगातार बढ़ा है। चीन की बढ़ती शक्ति के बीच भारत अमेरिका के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बन चुका है। ऐसे में जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील विषय पर भारत की सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज करना अमेरिका के लिए आसान नहीं है। हालांकि अमेरिकी राजदूत की टिप्पणी को लेकर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि अमेरिका ने कश्मीर पर अपनी पूरी विदेश नीति बदल दी है। किसी राजदूत का बयान और किसी देश की औपचारिक विदेश नीति में अंतर होता है। फिर भी यह बयान पाकिस्तान के लिए असहज करने वाला जरूर है। पाकिस्तान लंबे समय से यह चाहता रहा है कि कश्मीर को भारत और पाकिस्तान के बीच अंतरराष्ट्रीय विवाद के रूप में देखा जाए। इसके विपरीत भारत का स्पष्ट मत रहा है कि जम्मू-कश्मीर उसका अभिन्न हिस्सा है और सीमा पार आतंकवाद समाप्त किए बिना पाकिस्तान के साथ सामान्य संबंध संभव नहीं हैं। जम्मू-कश्मीर में बदलती परिस्थितियां भी इस विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सुरक्षा व्यवस्था में सुधार विकास परियोजनाओं पर्यटन निवेश और लोकतांत्रिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के प्रयासों ने क्षेत्र की तस्वीर को बदलने की कोशिश की है। अमेरिका की ओर से यात्रा संबंधी चेतावनियों की समीक्षा की संभावना का संकेत भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। यदि भविष्य में जम्मू-कश्मीर को लेकर ऐसी चेतावनियों में सकारात्मक बदलाव होता है तो इसका क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय छवि पर असर पड़ सकता है।

भारत ने लंबे समय से यह संदेश दिया है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। सिंधु जल संधि को लेकर तनाव और सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे ने दोनों देशों के संबंधों को और जटिल बनाया है। पाकिस्तान यदि एक ओर कश्मीर पर राजनीतिक बयानबाजी करता रहे और दूसरी ओर आतंकवाद के सवाल पर ठोस कार्रवाई न करे तो दोनों देशों के बीच संबंधों में सुधार की उम्मीद करना कठिन होगा। पाकिस्तान की एक बड़ी समस्या यह भी है कि उसकी विदेश नीति लंबे समय से कश्मीर के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन आर्थिक संकट और आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता के बीच उसके लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना पहले की तुलना में कठिन हो गया है। यह कहना सही नहीं होगा कि पाकिस्तान किसी एक देश के प्रभाव में पूरी तरह काम करता है। वह अपने हितों के अनुसार अमेरिका चीन खाड़ी देशों और अन्य शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश करता है। फिर भी अमेरिका के साथ संबंध उसके लिए आर्थिक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। भारत के लिए भी इस घटनाक्रम में आत्मसंतोष की कोई गुंजाइश नहीं है। किसी विदेशी राजदूत का बयान कूटनीतिक उपलब्धि हो सकता है लेकिन कश्मीर पर स्थायी सफलता का पैमाना इससे कहीं बड़ा है। वास्तविक सफलता तब होगी जब जम्मू-कश्मीर में स्थायी शांति मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था रोजगार विकास निवेश और पर्यटन का विस्तार हो। क्षेत्र के लोगों का विश्वास मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है जितना अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपना पक्ष मजबूती से रखना।
कश्मीर के सवाल पर भारत को अपनी कूटनीतिक बढ़त के साथ-साथ जमीनी स्तर पर भी लगातार काम करना होगा। विकास केवल आंकड़ों और परियोजनाओं में दिखाई देने के बजाय आम नागरिक के जीवन में महसूस होना चाहिए। लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती युवाओं के लिए रोजगार के अवसर और सुरक्षित वातावरण इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।