तमिलनाडु में तमिलगा वेत्री कड़गम की गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने थाईमामन थंगा मोथिरम थिट्टम यानी ‘मामा की सोने की अंगूठी योजना’ की घोषणा की है। इस योजना की औपचारिक शुरुआत पूर्व मुख्यमंत्री सी.एन. अन्नादुराई की जयंती पर 15 सितंबर 2026 को होगी। इसके तहत 22 जून 2026 या उसके बाद सरकारी अस्पतालों में जन्म लेने वाले बच्चों को लाभ देने की बात कही गई है। यह घोषणा भारतीय राजनीति में तेजी से बढ़ती उस प्रवृत्ति की एक और बानगी है जिसमें चुनावी राजनीति विकास की दीर्घकालिक नीतियों के बजाय तात्कालिक लाभ और लोकलुभावन घोषणाओं के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है। लोकतंत्र में सरकारों का दायित्व केवल सत्ता हासिल करना या उसे बनाए रखना नहीं बल्कि नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाने वाली नीतियां तैयार करना भी है। दुर्भाग्य से आज चुनाव विकास के स्थायी मॉडल रोजगार सृजन उत्कृष्ट शिक्षा बेहतर स्वास्थ्य औद्योगिक विस्तार मजबूत बुनियादी ढांचे और आर्थिक आत्मनिर्भरता जैसे मुद्दों से हटकर मुफ्त बिजली मुफ्त परिवहन नकद सहायता मुफ्त राशन और दूसरी तरह की रेवड़ियों की प्रतिस्पर्धा में बदलते जा रहे हैं। राजनीतिक दलों के बीच यह होड़ अब इतनी तीव्र हो गई है कि कल्याणकारी योजनाओं और चुनावी प्रलोभनों के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती जा रही है।
मध्य प्रदेश की लाड़ली बहना योजना कर्नाटक की गृह लक्ष्मी योजना पश्चिम बंगाल की लक्ष्मी भंडार योजना और तमिलनाडु की महिला वित्तीय सहायता जैसी योजनाएं बड़ी संख्या में लोगों को प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता देती हैं। इसी तरह विभिन्न राज्यों में महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की व्यवस्था है। पंजाब दिल्ली और कर्नाटक जैसे राज्यों में मुफ्त बिजली की योजनाएं भी राजनीतिक बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं। किसानों के लिए अतिरिक्त आर्थिक सहायता छात्र-छात्राओं के लिए छात्रवृत्ति मुफ्त अध्ययन सामग्री स्वास्थ्य बीमा और अन्य सुविधाओं का दायरा भी लगातार बढ़ता गया है। केंद्र सरकार की अनेक योजनाओं का उद्देश्य भी गरीब और वंचित वर्ग को खाद्य सुरक्षा स्वास्थ्य आवास शिक्षा ऊर्जा और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री आवास योजना उज्ज्वला योजना किसान सम्मान निधि जन औषधि योजना और छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं ने करोड़ों लोगों तक सहायता पहुंचाई है। इन योजनाओं और सीधे चुनावी लाभ के लिए घोषित मुफ्त सुविधाओं के बीच अंतर करना इसलिए जरूरी है क्योंकि हर कल्याणकारी योजना को मुफ्तखोरी कहना भी उतना ही गलत होगा जितना हर मुफ्त घोषणा को सामाजिक कल्याण मान लेना। समस्या तब शुरू होती है जब सरकारी सहायता का उद्देश्य नागरिकों को सक्षम बनाने के बजाय उन्हें लगातार सरकारी सहायता पर निर्भर बनाए रखना हो। किसी गरीब परिवार को भोजन उपलब्ध कराना सामाजिक जिम्मेदारी है लेकिन उसके परिवार को स्थायी रूप से गरीबी से बाहर निकालने के लिए रोजगार और कौशल का अवसर न देना अधूरी नीति है। किसी किसान को आर्थिक सहायता देना राहत हो सकती है लेकिन कृषि को अधिक उत्पादक और लाभकारी बनाने की व्यवस्था किए बिना केवल नकद सहायता पर निर्भर रहना दीर्घकाल में समाधान नहीं है। सबसे गंभीर प्रश्न सरकारी खजाने पर पड़ने वाले बोझ का है। राज्यों की आय सीमित है और उनकी जिम्मेदारियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में यदि चुनाव दर चुनाव नई मुफ्त योजनाओं की घोषणा होती रही तो सरकारों के पास शिक्षा स्वास्थ्य सिंचाई सड़क परिवहन और औद्योगिक आधारभूत ढांचे जैसे दीर्घकालिक क्षेत्रों में निवेश के लिए संसाधन कम पड़ सकते हैं। आज की लोकप्रिय घोषणा कल के बजट पर दबाव बन सकती है और आने वाली पीढ़ी को इसका आर्थिक बोझ उठाना पड़ सकता है।
मुफ्त योजनाओं का दूसरा खतरा राजनीतिक संस्कृति से जुड़ा है। जब मतदाता किसी सुविधा को सरकार की अस्थायी सहायता के बजाय स्थायी अधिकार समझने लगता है तो किसी भी सरकार के लिए वित्तीय अनुशासन कायम करना कठिन हो जाता है। राजनीतिक दल भी इस मानसिकता को बदलने के बजाय उसे और मजबूत करने में अपना हित देखते हैं। परिणाम यह होता है कि चुनावी घोषणापत्र आर्थिक दृष्टि से व्यवहारिक नीतियों के दस्तावेज के बजाय मुफ्त सुविधाओं की सूची बनते जाते हैं। यह भी चिंता का विषय है कि ऐसी राजनीति समाज में श्रम और उद्यम की प्रतिष्ठा को कमजोर कर सकती है। यदि युवाओं के सामने रोजगार कौशल उद्यमिता और उत्पादन के अवसरों के बजाय लगातार सरकारी सहायता को प्राथमिक विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा तो आत्मनिर्भर समाज का निर्माण कैसे होगा। सहायता का उद्देश्य व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा करना होना चाहिए न कि उसे हमेशा सहायता का पात्र बनाए रखना। इसलिए मुफ्तखोरी और कल्याणकारी राज्य के बीच स्पष्ट अंतर करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। गरीबों को भोजन स्वास्थ्य शिक्षा आवास और सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन ऐसी योजनाओं का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि वे कितने लोगों को गरीबी से बाहर निकाल रही हैं कितने युवाओं को रोजगार दे रही हैं कितने परिवारों की आय बढ़ा रही हैं और देश की उत्पादक क्षमता को कितना मजबूत कर रही हैं। राजनीतिक दलों को भी यह बताना होगा कि चुनावी घोषणाओं के लिए धन कहां से आएगा। क्या किसी मुफ्त योजना के कारण किसी दूसरे विकास कार्य का बजट कम होगा। क्या राज्य की वित्तीय स्थिति उस योजना का भार लंबे समय तक उठा सकती है। क्या इससे रोजगार और निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इन सवालों का जवाब देना लोकतांत्रिक राजनीति की जिम्मेदारी है।