देश के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकसित भारत के संकल्प को एक बार फिर देश के सामने रखा। करीब 76 मिनट के संबोधन में उन्होंने उपलब्धियों का उल्लेख करने के साथ आने वाले वर्षों की प्राथमिकताएं भी स्पष्ट कीं। आत्मनिर्भरता से लेकर युवा शक्ति, महिला सशक्तीकरण, तकनीकी विकास, विनिर्माण, रक्षा उत्पादन, कृषि और सांस्कृतिक सामर्थ्य तक उनके भाषण में विकसित भारत की व्यापक तस्वीर दिखाई दी। प्रधानमंत्री का संदेश स्पष्ट था कि 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए केवल आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए सामाजिक स्थिरता, युवा शक्ति, महिलाओं की भागीदारी और तकनीकी क्षमता को भी समान महत्व देना होगा। उन्होंने विकास की गति तेज करने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि जिन कामों को पूरा करने में दशकों लगे उन्हें आने वाले वर्षों में तेजी से पूरा करने का प्रयास होना चाहिए। आत्मनिर्भर भारत को प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय हित और सुरक्षा से जोड़ते हुए कहा कि वैश्विक परिस्थितियों में आवश्यक वस्तुओं के लिए दूसरे देशों पर अत्यधिक निर्भरता देश के लिए चुनौती बन सकती है। पेट्रोलियम, खाद और दवाइयों से लेकर तकनीक तक अपनी क्षमता बढ़ाना इसलिए जरूरी है। सेमीकंडक्टर निर्माण को उन्होंने इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। भारत को केवल बड़ा बाजार नहीं बल्कि वैश्विक उत्पादन और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखला का प्रमुख केंद्र बनाने की उनकी सोच इसमें स्पष्ट दिखाई देती है। युवाओं को लेकर प्रधानमंत्री ने कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। अगले एक वर्ष में एक करोड़ युवाओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रशिक्षण देने का लक्ष्य हो या गरीब और मध्यमवर्गीय युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की निशुल्क ऑनलाइन कोचिंग की पहल। इन योजनाओं का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी ताकत है। जरूरत इस बात की है कि शिक्षा और कौशल के अवसर अंतिम छोर तक पहुंचें और युवाओं को रोजगार के साथ नवाचार के अवसर भी मिलें।
महिला सशक्तीकरण भी संबोधन का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। प्रधानमंत्री ने महिला आरक्षण कानून का उल्लेख करते हुए लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व देने की आवश्यकता पर जोर दिया। राजनीतिक दलों से इस विषय पर सहयोग की अपील का व्यापक संदेश यही है कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को केवल चुनावी मुद्दा न बनाकर लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम बनाया जाए। प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद के साथ वैचारिक चुनौतियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने हथियारबंद नक्सलवाद के कमजोर होने की बात कहते हुए युवाओं को भटकाने वाली प्रवृत्तियों से सावधान रहने की जरूरत बताई। यह चिंता इस बात की ओर संकेत करती है कि विकास के साथ सामाजिक विश्वास और सकारात्मक वातावरण बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। कृषि और किसानों को भी विकसित भारत की बुनियाद बताते हुए प्रधानमंत्री ने खाद्य सुरक्षा के साथ कृषि क्षेत्र की क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया। बदलती वैश्विक परिस्थितियों में खाद और ऊर्जा जैसी आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता को आत्मनिर्भरता से जोड़ना इस बात का संकेत है कि कृषि नीति को अब केवल उत्पादन तक सीमित रखने के बजाय राष्ट्रीय आर्थिक और रणनीतिक जरूरतों से जोड़ना होगा।
भारत की सांस्कृतिक शक्ति को भी प्रधानमंत्री ने विकास की नई संभावनाओं से जोड़ा। योग और आयुर्वेद से लेकर हस्तशिल्प, फिल्म, गेमिंग, एनीमेशन और डिजिटल सामग्री तक उन्होंने भारतीय संस्कृति और रचनात्मक उद्योगों को वैश्विक प्रभाव बढ़ाने का माध्यम बताया। भारत की सांस्कृतिक विरासत यदि आधुनिक तकनीक और रचनात्मक अर्थव्यवस्था से जुड़ती है तो यह देश के लिए रोजगार और आर्थिक अवसरों का बड़ा क्षेत्र बन सकती है। प्रधानमंत्री के संबोधन का मूल भाव आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और तेज विकास रहा। 2047 का विकसित भारत केवल घोषणाओं से नहीं बनेगा। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार, कृषि सुधार, महिला भागीदारी, तकनीकी क्षमता, मजबूत संस्थान और सामाजिक समरसता पर लगातार काम करना होगा। स्वतंत्रता दिवस अतीत को याद करने के साथ भविष्य की दिशा तय करने का अवसर भी है। प्रधानमंत्री ने विकसित भारत का लक्ष्य देश के सामने रखा है। अब जरूरत इस बात की है कि इस लक्ष्य को राजनीतिक नारों से आगे ले जाकर जनभागीदारी और ठोस नीतियों का अभियान बनाया जाए। विकास की रफ्तार तभी सार्थक होगी जब उसका लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे और देश के भीतर अवसरों तथा विश्वास का विस्तार हो। यही स्वतंत्रता की शताब्दी की ओर बढ़ते भारत के संकल्प को वास्तविक अर्थ दे सकता है।