यात्रियों की जिंदगी से खिलवाड़

यमुना एक्सप्रेसवे पर दिल्ली से महोबा जा रही बस में आग लगने से नौ यात्रियों की मौत ने सड़क परिवहन व्यवस्था की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रेटर नोएडा क्षेत्र में हुए इस हादसे में करीब 35 यात्री सवार बताए गए। सबसे चिंताजनक बात यह है कि यात्रियों के अनुसार बस में जलने की गंध आने लगी थी। उन्होंने चालक और परिचालक को इसकी जानकारी देकर बस रोकने का आग्रह किया लेकिन उनकी चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया गया। कुछ ही देर बाद बस आग की लपटों में घिर गई। चलती बस में आग लगना बेहद गंभीर आपात स्थिति है। ऐसे समय में चालक और परिचालक की पहली जिम्मेदारी यात्रियों की जान बचाना होती है। यदि वाहन से जलने की गंध या धुआं आने लगे तो तत्काल बस रोककर जांच करना जरूरी है। कुछ मिनट की देरी यात्रा को प्रभावित कर सकती है लेकिन यात्रियों की जान बचाने के लिए यह देरी कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। अब जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि यात्रियों की सूचना के बाद बस क्यों नहीं रोकी गई और आग लगने से पहले सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए।

इस हादसे को केवल तकनीकी खराबी का मामला मानकर समाप्त नहीं किया जा सकता। बस की फिटनेस जांच कब हुई थी। विद्युत तारों और ईंधन प्रणाली की स्थिति कैसी थी। अग्निशमन यंत्र और आपातकालीन निकास काम करने की स्थिति में थे या नहीं। चालक और परिचालक को आपात स्थिति से निपटने का प्रशिक्षण मिला था या नहीं। इन सभी सवालों के जवाब जरूरी हैं। सार्वजनिक परिवहन में यात्री अपना जीवन चालक और परिचालक के भरोसे छोड़कर यात्रा करता है। इसलिए उनकी जिम्मेदारी केवल बस को गंतव्य तक पहुंचाने की नहीं बल्कि यात्रा के दौरान यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी है। यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जवाबदेही तय होनी चाहिए। यह जिम्मेदारी केवल चालक या परिचालक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए बल्कि वाहन मालिक और संबंधित निगरानी व्यवस्था की भूमिका भी जांची जानी चाहिए।

मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे पर भी एक निजी बस में आग लगने की घटना सामने आई जिसमें सभी 14 यात्रियों के सुरक्षित बचने की सूचना है। दोनों घटनाओं के परिणाम अलग रहे लेकिन दोनों से एक समान सबक मिलता है कि बसों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर लगातार सतर्कता जरूरी है। हादसे के बाद कुछ दिनों तक जांच और चर्चा करने के बजाय नियमित तकनीकी निरीक्षण और सुरक्षा मानकों का पालन व्यवस्था का स्थायी हिस्सा बनना चाहिए। यात्रियों को भी बस में आपातकालीन निकास और अग्निशमन यंत्र जैसी व्यवस्थाओं की जानकारी रखनी चाहिए। वाहन से धुआं या जलने की गंध आए तो आवाज उठाना उनका अधिकार है। लेकिन उससे भी जरूरी यह है कि चालक और परिचालक ऐसी चेतावनी को गंभीरता से लें। नौ यात्रियों की मौत केवल नौ आंकड़े नहीं हैं। इनके पीछे परिवार थे। सपने थे और अपनों के लौटने की उम्मीद थी। अब इस हादसे से ऐसी व्यवस्था बनाने की जरूरत है जिसमें किसी यात्री की सुरक्षा संबंधी शिकायत को कभी नजरअंदाज न किया जाए। मंजिल तक पहुंचने में कुछ मिनट की देरी स्वीकार की जा सकती है लेकिन मानव जीवन से बड़ा कोई गंतव्य नहीं है।