दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रस्तावित प्रदर्शन से पहले जिस तरह पुलिस ने कार्रवाई की उसने लोकतंत्र में असहमति और विरोध के अधिकार को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग को लेकर बुलाए गए प्रदर्शन को दिल्ली पुलिस ने अनुमति नहीं दी। इसके बाद सीजेपी संस्थापक अभिजीत दिपके सहित पार्टी के नेताओं को विमान से उतरने के बाद हिरासत में लिया गया। यूट्यूबर ध्रुव राठी को भी हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई। राजधानी में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई ने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया है कि लोकतंत्र में विरोध को नियंत्रित करने और विरोध की आवाज को दबाने के बीच सीमा कहां तय होगी? कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार और पुलिस की जिम्मेदारी है। किसी भी प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक सुरक्षा और यातायात की चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन प्रतिबंधों और हिरासत जैसी कार्रवाइयों की वैधता और आवश्यकता भी पारदर्शी होनी चाहिए।
चुनावी धांधली के आरोप गंभीर हैं और उनका फैसला राजनीतिक बयानबाजी से नहीं बल्कि प्रमाणों तथा निष्पक्ष जांच से होना चाहिए। विपक्ष को भी अपने आरोपों के समर्थन में तथ्य प्रस्तुत करने चाहिए। वहीं चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की जिम्मेदारी है कि वह मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों का स्पष्ट जवाब देकर जनता का विश्वास मजबूत करे। लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि सरकार की आलोचना करने वाले को भी अपनी बात कहने का अधिकार मिले। यदि प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई तो उसके कारण स्पष्ट होने चाहिए और कानून के दायरे में शांतिपूर्ण असहमति के लिए रास्ता भी उपलब्ध रहना चाहिए। दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों का दायित्व है कि वे कानून का पालन करें और आंदोलन को शांतिपूर्ण रखें।
सत्ता की मजबूती विरोध की आवाज रोकने में नहीं बल्कि आलोचना का सामना करने और सवालों का जवाब देने में दिखाई देती है। लोकतंत्र में न आरोप अपने आप प्रमाण बन जाते हैं और न सरकारी कार्रवाई अपने आप न्यायसंगत साबित होती है। भारत की लोकतांत्रिक प्रतिष्ठा इसी में है कि चुनावी पारदर्शिता पर उठे सवालों की निष्पक्ष पड़ताल हो और विरोध करने वालों के अधिकारों की रक्षा भी सुनिश्चित की जाए।