नाना पाटेकर : एक आवाज जो पर्दे से निकलकर समाज तक पहुंची

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो केवल अभिनय नहीं करते बल्कि अपने किरदारों के जरिए समाज के भीतर छिपे सवालों को आवाज देते हैं। नाना पाटेकर उन्हीं विरले कलाकारों में से एक थे। 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में गोवा के डोना पाउला स्थित अपने आवास पर उनका निधन केवल फिल्म जगत की क्षति नहीं है बल्कि उस बेबाक आवाज का मौन हो जाना है जो जिंदगी भर दिखावे से दूर रही और सच को सच कहने से कभी नहीं डरी। नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। महाराष्ट्र की मिट्टी से निकले इस कलाकार ने रंगमंच से अपनी यात्रा शुरू की और आगे चलकर हिंदी तथा मराठी सिनेमा में अपनी ऐसी पहचान बनाई जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। लगभग पांच दशक लंबे अभिनय सफर में उन्होंने सौ से अधिक फिल्मों में काम किया और तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल किए। ‘परिंदा’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता ‘क्रांतिवीर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और ‘अग्निसाक्षी’ के लिए एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार उनके अभिनय की विविधता और गहराई का प्रमाण है। वर्ष 2013 में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। लेकिन नाना की असली पहचान पुरस्कारों की लंबी सूची में नहीं थी। उनकी पहचान उस आवाज में थी जो संवाद बोलते समय केवल किरदार की नहीं बल्कि समाज की बेचैनी को व्यक्त करती थी। ‘अंकुश’ से लेकर ‘क्रांतिवीर’ और ‘तिरंगा’ तक उनके कई किरदारों में व्यवस्था के प्रति सवाल दिखाई दिए। उनकी संवाद अदायगी में आक्रोश था लेकिन वह आक्रोश केवल अभिनय नहीं लगता था। उसमें उस आम आदमी की बेचैनी सुनाई देती थी जो व्यवस्था से सवाल करना चाहता है।

नाना पाटेकर का व्यक्तित्व फिल्मों की चमक-दमक से कहीं अलग था। वह सादगी पसंद थे और ग्रामीण जीवन तथा किसानों के संघर्ष से उनका गहरा जुड़ाव रहा। महाराष्ट्र में सूखे और किसान संकट के बीच उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ 2015 में ‘नाम फाउंडेशन’ की स्थापना की। संस्था ने किसान परिवारों की सहायता के साथ जल संरक्षण और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में भी काम किया। यही वह अंतर था जो नाना को बाकी सितारों से अलग करता था। बहुत से कलाकार समाज की समस्याओं पर बोलते हैं लेकिन नाना ने अपनी लोकप्रियता को जमीन पर उतरकर काम करने का माध्यम बनाया। उनका मानना था कि यदि किसी कलाकार के पास करोड़ों लोगों तक अपनी बात पहुंचाने की ताकत है तो उस ताकत का इस्तेमाल केवल मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि समाज के सवालों को सामने लाने के लिए भी होना चाहिए। उनकी बेबाकी राजनीति तक भी पहुंचती थी। वह किसी एक राजनीतिक खांचे में खुद को सीमित करने के बजाय अच्छे काम की तारीफ और गलत काम पर सवाल करने की बात करते थे। यही स्वतंत्र सोच उनकी सार्वजनिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके निधन पर उन्हें ऐसी शख्सियत बताया जिसकी तीव्रता अलग थी और जिसकी बेबाक राय के लिए भी वह जाने जाते थे। विडंबना देखिए कि जीवन और मृत्यु पर गहरी बातें करने वाला यह कलाकार अपनी जिंदगी के आखिरी घंटों में स्वयं मौत से जूझ रहा था। अस्पताल से सामने आई जानकारी के अनुसार 8 अक्टूबर की सुबह करीब ढाई बजे उन्होंने एक मित्र को तबीयत खराब होने और शरीर के बाईं ओर दर्द होने का संदेश भेजा था। मित्र ने संदेश कुछ देर बाद देखा और करीब चार बजे उनके आवास पहुंचा। नाना वहां अचेत अवस्था में मिले और उन्हें तत्काल मणिपाल अस्पताल ले जाया गया। चिकित्सकों ने करीब 45 मिनट तक उन्हें बचाने का प्रयास किया लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। सुबह करीब 5:20 बजे उनके निधन की पुष्टि हुई। मृत्यु से कुछ दिन पहले ही गोवा में एक कार्यक्रम के दौरान नाना ने जीवन की अनिश्चितता पर बात करते हुए कहा था कि उन्हें नहीं पता कि वह अगले दिन यहां होंगे या नहीं। नाना पाटेकर की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही थी कि उन्होंने कभी खुद को सिर्फ अभिनेता नहीं माना। पर्दे पर वह जितने प्रभावशाली थे वास्तविक जीवन में उतने ही सहज। प्रसिद्धि के शिखर पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने गांव और खेत से अपना रिश्ता बनाए रखा। यही कारण है कि उनके जाने के बाद चर्चा केवल उनकी फिल्मों की नहीं हो रही बल्कि उनके सामाजिक सरोकारों और जीवन दर्शन की भी हो रही है।

महाराष्ट्र सरकार ने उनके मराठी रंगमंच तथा हिंदी और मराठी सिनेमा में योगदान को देखते हुए पुणे के डोणजे स्थित उनके फार्महाउस पर राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया है। नाना पाटेकर चले गए लेकिन उनके किरदार रह गए। उनके संवाद रह गए। उनकी बेबाकी रह गई। और सबसे बढ़कर वह सवाल रह गए जिन्हें उन्होंने अपनी कला के जरिए समाज के सामने खड़ा किया था। सितारे आते हैं और चले जाते हैं। कुछ सितारे अपनी चमक छोड़ जाते हैं। लेकिन नाना पाटेकर उन कलाकारों में थे जिन्होंने रोशनी से ज्यादा अपनी आवाज छोड़ी। ऐसी आवाज जो सत्ता से सवाल कर सकती थी और समाज के कमजोर आदमी के दर्द को महसूस कर सकती थी। नाना का जाना एक अभिनेता का जाना भर नहीं है। यह उस कलाकार का जाना है जिसने हमें याद दिलाया कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं बल्कि समाज का आईना भी हो सकता है। पर्दा गिर गया है लेकिन नाना की आवाज अभी बाकी है।