राहुल गांधी ने करीब चार महीने पहले दावा किया था कि नरेंद्र मोदी सरकार एक वर्ष के भीतर गिर जाएगी। उस समय भाजपा ने उनके बयान को राजनीतिक बयानबाजी बताकर खारिज कर दिया था। लेकिन अब एसआईआर को लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में उठ रहे सवालों और विरोध प्रदर्शनों ने राजनीतिक माहौल को जरूर गरमा दिया है।
विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूचियों से बड़ी संख्या में पात्र लोगों के नाम बाहर हो रहे हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग का तर्क है कि मतदाता सूचियों को शुद्ध और त्रुटिरहित बनाना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी हो और किसी भी पात्र नागरिक को उसके मताधिकार से वंचित न होना पड़े। मतदाता सूची में नाम होना लोकतंत्र में नागरिक की सबसे बुनियादी राजनीतिक पहचान है। यदि किसी पात्र व्यक्ति का नाम गलती से सूची से हट जाता है तो वह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं बल्कि उसके लोकतांत्रिक अधिकार का मामला बन जाता है। इसलिए नाम हटाने और जोड़ने की प्रक्रिया सरल होनी चाहिए तथा प्रभावित नागरिक को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
एसआईआर को लेकर विपक्षी दलों के साथ सामाजिक संगठनों और नागरिक समूहों की सक्रियता भी बढ़ी है। जगह-जगह प्रदर्शन और विरोध इस बात का संकेत हैं कि यह मुद्दा अब केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहा। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना इसलिए गंभीर है क्योंकि चुनावी लोकतंत्र की विश्वसनीयता काफी हद तक इसी संस्था की निष्पक्षता पर निर्भर करती है। राहुल गांधी की सरकार गिरने की भविष्यवाणी सही साबित होगी या नहीं यह संसद के आंकड़े और बदलते राजनीतिक समीकरण तय करेंगे। अभी इसे निश्चित भविष्यवाणी मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन उनके बयान से अलग मौजूदा परिस्थितियों ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या जनता का चुनावी व्यवस्था पर भरोसा पूरी तरह कायम है। सरकारें आती-जाती रहती हैं लेकिन चुनाव आयोग और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का विश्वास कमजोर होना पूरे देश के लिए चिंता का विषय है। इसलिए जरूरत राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें हर पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में सुरक्षित रहे और उसे बिना किसी भय या भ्रम के अपने मताधिकार का प्रयोग करने का अवसर मिले।