बंगाल की सियासत में नए समीकरण और पुरानी पकड़ की परीक्षा

पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है। हाल के दिनों में हुमायु कबीर और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के संभावित गठबंधन की चर्चा ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। इस संभावित समीकरण को सीधे तौर पर ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की स्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है परंतु हकीकत इतनी सरल नहीं है।
ममता बनर्जी की राजनीतिक पकड़ आज भी राज्य के गांव-गांव में गहरी है। उनकी छवि केवल एक नेता की नहीं बल्कि जननायक की है जो सीधे जनता से संवाद करती हैं। ऐसे में किसी भी नए गठबंधन से तृणमूल कांग्रेस की जड़ों को तुरंत हिला देना संभव नहीं दिखता।

मुस्लिम वोट बैंक को लेकर जरूर नई हलचल देखी जा रही है। बंगाल में यह वर्ग लंबे समय से तृणमूल के साथ रहा है लेकिन एआईएमआईएम की रणनीति इसी आधार में सेंध लगाने की रही है। यदि स्थानीय प्रभाव वाले नेता इस दल के साथ आते हैं तो सीमित क्षेत्रों में वोटों का बंटवारा संभव है खासकर मुर्शिदाबाद मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों में।
फिर भी यह समझना जरूरी है कि गठबंधन का मतलब स्वतः वोट ट्रांसफर नहीं होता। बंगाल की राजनीति में स्थानीय बनाम बाहरी का मुद्दा हमेशा प्रभावी रहा है और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को अक्सर बाहरी नजरिये से देखा जाता है। यही कारण है कि संभावित गठबंधन का असर व्यापक होने के बजाय क्षेत्रीय सीमाओं तक सिमट सकता है।

दिलचस्प पहलू यह है कि इस तरह के समीकरण का अप्रत्यक्ष लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। यदि विपक्षी वोटों में विभाजन होता है तो त्रिकोणीय मुकाबले में भाजपा की स्थिति मजबूत हो सकती है। यही वजह है कि बंगाल का चुनाव अब पहले से अधिक जटिल और बहुकोणीय हो गया है। भाजपा ने भी पिछले वर्षों में राज्य में अपनी जमीनी उपस्थिति मजबूत की है। बूथ स्तर तक संगठन का विस्तार केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता और वैचारिक मुद्दों की आक्रामक प्रस्तुति ने उसे एक मजबूत चुनौतीकर्ता बना दिया है। हालांकि इसके बावजूद ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और तृणमूल का संगठनात्मक ढांचा अब भी उसकी सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है।

ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने संघर्ष के दम पर सत्ता तक पहुंच बनाई। 1998 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना और 2011 में वाम मोर्चे के लंबे शासन को समाप्त करना उनकी राजनीतिक दृढ़ता का प्रमाण है। उनकी सादगी जनसंवाद और योजनाओं ने उन्हें जनता के बीच एक भरोसेमंद नेता के रूप में स्थापित किया है। हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सत्ता विरोधी माहौल भ्रष्टाचार के आरोप और आंतरिक असंतोष जैसे मुद्दे तृणमूल के सामने खड़े हैं। वहीं भाजपा इन्हीं मुद्दों को आधार बनाकर अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। अंततः पश्चिम बंगाल का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं बल्कि राजनीतिक दिशा तय करने का निर्णायक क्षण है। एक ओर तृणमूल कांग्रेस अपनी पकड़ बनाए रखने की परीक्षा दे रही है तो दूसरी ओर भाजपा इसे अवसर के रूप में देख रही है। वहीं छोटे दल और नए गठबंधन इस मुकाबले को और पेचीदा बना रहे हैं।

स्पष्ट है कि हुमायु कबीर और एआईएमआईएम का संभावित गठबंधन हलचल जरूर पैदा करेगा परंतु तृणमूल कांग्रेस को जड़ से हिलाने के लिए यह पर्याप्त नहीं है। असली मुकाबला अब भी मुख्यतः तृणमूल और भाजपा के बीच ही केंद्रित है। आखिरकार लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता के हाथ में होता है और बंगाल की जनता ही तय करेगी कि राज्य की सत्ता किसे सौंपनी है।