ट्रांसपोर्टर्स पर इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने का सरकारी दबाव , बुनियादी ढांचे के अभाव और नीतियों के फेर में फंसकर देश का परिवहन उद्योग हुआ परेशान
नई दिल्ली । देश में कमर्शियल वाहनों के इलेक्ट्रिक व्हीकल (ईवी) में परिवर्तन को लेकर सरकार और ट्रांसपोर्टर्स के बीच खींचतान तेज हो गई है। मिनिस्ट्री ऑफ हैवी इंडस्ट्रीज द्वारा इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के दबाव ने ट्रांसपोर्टर्स को गहरी चिंता में डाल दिया है। परिवहन विशेषज्ञ अनिल छिकारा के अनुसार, बीएस-3 से बीएस-6 के सफर के बाद अब बिना तैयारी के अचानक इलेक्ट्रिक वाहनों पर जोर देना ट्रांसपोर्टर्स के लिए आर्थिक संकट का सबब बन गया है। बिना मजबूत चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर के ईवी को अपनाने का दबाव व्यावहारिक नहीं है, जिससे व्यापार की निरंतरता प्रभावित हो रही है।
सरकार द्वारा बीएस-4 वाहनों को प्रदूषण का कारण मानकर दिल्ली में प्रवेश पर रोक लगाना तकनीकी रूप से विवादित बना हुआ है। विशेषज्ञ का कहना है कि सरकार के अपने आंकड़ों के अनुसार, टेलपाइप एमिशन के मामले में बीएस-4 और बीएस-6 वाहनों के मानक समान (50 HSU) हैं। ऐसे में सिर्फ इंजन के मानक के आधार पर लाखों वाहनों को प्रतिबंधित करना तर्कहीन है। असली प्रदूषण गाड़ी की नियमित मेंटेनेंस और लोड पर निर्भर करता है, न कि केवल उसके निर्माण वर्ष पर। सरकार की यह कार्यप्रणाली लाखों ट्रक मालिकों के लिए अन्यायपूर्ण साबित हो रही है।
अनिल छिकारा ने सुझाव दिया कि सरकार को सब्सिडी के बजाय बेहतर बुनियादी ढांचे जैसे नेशनल हाईवे पर चार्जिंग स्टेशन और सड़क किनारे प्रदूषण जांचने वाली आधुनिक तकनीकों पर ध्यान देना चाहिए। गाड़ियों को प्रतिबंधित करने के बजाय बॉर्डर पर उनकी भौतिक और तकनीकी जांच की जानी चाहिए, ताकि केवल प्रदूषित वाहनों पर ही कार्रवाई हो। सरकार की नीतिगत अस्पष्टता और दोहरे मापदंडों ने ट्रांसपोर्टर्स को अपना व्यापार बंद करने की कगार पर ला खड़ा किया है। यदि समय रहते नीतियों में सुधार नहीं किया गया, तो देश की लॉजिस्टिक सप्लाई चेन पर इसका गहरा असर पड़ेगा।