महिला आरक्षण से बदलेगा लोकतंत्र का स्वरूप

16 अप्रैल आज से शुरू हो रहा संसद का विशेष सत्र भारतीय लोकतंत्र के लिए एक निर्णायक मोड़ लेकर आया है। लंबे इंतजार और व्यापक राजनीतिक बहस के बाद पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम अब देश की राजनीतिक संरचना में ऐतिहासिक बदलाव की आधारशिला बनने जा रहा है। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का प्रावधान केवल एक विधायी निर्णय नहीं बल्कि लोकतंत्र को अधिक प्रतिनिधिक और संतुलित बनाने की दिशा में बड़ा कदम है।

अब तक संसद में महिलाओं की भागीदारी सीमित रही है। इंदिरा गांधी सुषमा स्वराज और ममता बनर्जी जैसी नेताओं ने अपनी मजबूत पहचान जरूर बनाई लेकिन कुल संख्या के लिहाज से महिलाओं का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम ही रहा। ऐसे में यह आरक्षण केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रयास नहीं बल्कि नीति निर्माण में महिलाओं की सोच संवेदना और अनुभव को शामिल करने का माध्यम भी बनेगा। इस कानून के लागू होने के बाद संसद और विधानसभाओं की कार्यप्रणाली में बदलाव की संभावना है। महिला जनप्रतिनिधियों की बढ़ती भागीदारी से शिक्षा स्वास्थ्य पोषण और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को अधिक गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ उठाया जा सकेगा। इससे नीतियां जमीनी हकीकत के अधिक करीब और समावेशी बन सकती हैं।

हालांकि इस बदलाव के साथ चुनौतियां भी कम नहीं हैं। राजनीतिक दलों को केवल टिकट वितरण तक सीमित न रहकर महिला नेतृत्व को तैयार करने पर ध्यान देना होगा। सामाजिक मानसिकता में बदलाव और राजनीतिक प्रशिक्षण के बिना यह आरक्षण अपने पूर्ण उद्देश्य को हासिल नहीं कर पाएगा। सबसे बड़ी जटिलता परिसीमन की प्रक्रिया को लेकर सामने आ रही है। जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण से विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों में प्रतिनिधित्व को लेकर आशंकाएं उभर रही हैं। इन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है जबकि अन्य क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि अधिक रही है ऐसे में सीटों के संतुलन को लेकर चिंता स्वाभाविक है।

केंद्र सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि महिला आरक्षण और परिसीमन अलग प्रक्रियाएं हैं और किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा। लेकिन केवल आश्वासन से भरोसा कायम नहीं होता इसके लिए पारदर्शी नीति और सभी राज्यों के साथ सतत संवाद जरूरी है। ऐसा संतुलित मॉडल तैयार करना होगा जिसमें महिला सशक्तिकरण के साथ क्षेत्रीय संतुलन भी बना रहे।
महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने का उद्देश्य आरक्षित सीटों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना था लेकिन यही प्रावधान अब विवाद का कारण बनता दिख रहा है। ऐसे में यह आवश्यक है कि इस प्रक्रिया में केवल जनसंख्या ही नहीं बल्कि अन्य मानकों को भी शामिल करने पर विचार किया जाए ताकि सभी राज्यों को समान और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व मिल सके।
स्पष्ट है कि महिला आरक्षण केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम है। यह लोकतंत्र को अधिक समावेशी और संवेदनशील बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यदि इसे सही नीयत और संतुलित दृष्टिकोण के साथ लागू किया गया तो यह न केवल संसद की तस्वीर बदलेगा बल्कि देश की राजनीति को भी नई दिशा देगा।