मुंबई में नई राजनीतिक दरारें दिखाती ‘सफेद पट्टी’

मुंबई में जैन समुदाय और स्थानीय निवासियों के बीच सड़कों पर बनाई गई सफेद पट्टियों को लेकर शुरू हुआ विवाद केवल एक आवासीय सोसायटी का मतभेद नहीं है बल्कि यह देश में बढ़ती सामाजिक और सांप्रदायिक संवेदनशीलता का संकेत भी है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक या साझा स्थानों में बदलाव तय नियमों और सभी पक्षों की सहमति से होना चाहिए। यदि इस प्रक्रिया की अनदेखी होती है तो असंतोष और टकराव की स्थिति पैदा होना स्वाभाविक है।

विवाद तब शुरू हुआ जब मुंबई की एक रिहायशी कॉलोनी में कुछ जैन अनुयायियों ने एक सफेद पट्टी बनाई ताकि जैन मुनि इमारत में आने के लिए उस रास्ते पर चल सकें। सफ़ेद ऑयल पेंट से रंगी पट्टी पर काई या शैवाल नहीं उगते जिससे जैन साधु और साध्वियां बिना किसी जीव को नुकसान पहुंचाए और अहिंसा के अपने कड़े नियमों का पालन करते हुए चल सकते हैं। जैन तपस्वी आमतौर पर नंगे पैर चलते हैं और सफ़ेद पट्टी रास्ते को ठंडा भी रखती है। समस्या यह है कि दूसरे गैर-जैन सदस्यों से पूछे बिना इमारत के परिसर में यह पट्टी बनायी गयी थी। इस बात से नाराज़ सदस्य मांग कर रहे हैं कि जैन समुदाय की इस मनमानी को हाउसिंग सोसाइटी में मंज़ूरी नहीं मिलनी चाहिए। एक प्रदर्शनकारी ने पूछा कि क्या उसके लिए केसरिया रंग की पट्टियां बनाना और किसी दूसरे समुदाय के लिए परिसर को हरे रंग से रंगना ठीक होगा? इस तरह उन्होंने विवाद को ऐसे साफ़ शब्दों में पेश किया जिससे पता चलता है कि कुछ समय पहले तक अच्छे माने वाले रिश्तों में कितना गुस्सा और कड़वाहट घुल गई है।

चिंताजनक पहलू यह है कि एक छोटी-सी प्रशासनिक और सामाजिक असहमति ने धीरे-धीरे भाषाई पहचान धार्मिक भावनाओं और राजनीतिक झुकाव का रूप ले लिया। जैन धर्म अपनी अहिंसा सहिष्णुता और अनेकांतवाद की परंपरा के लिए विश्वभर में सम्मानित रहा है। महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांत भी जैन दर्शन से गहराई से प्रभावित रहे हैं। ऐसे में इस विवाद के दौरान कुछ लोगों की आक्रामक टिप्पणियां और टकरावपूर्ण भाषा जैन धर्म की मूल भावना के विपरीत दिखाई देती है। वास्तव में समाज में नफरत और विभाजन की राजनीति कभी किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहती। जब धार्मिक पहचान भाषाई अस्मिता और राजनीतिक हित एक-दूसरे में उलझने लगते हैं तब छोटी घटनाएं भी बड़े सामाजिक संकट का रूप ले सकती हैं। मुंबई में बढ़ती स्थानीय असंतुष्टि आर्थिक असमानता बड़े औद्योगिक समूहों को मिलने वाले प्रोजेक्ट और क्षेत्रीय अस्मिता के प्रश्नों ने इस विवाद को और जटिल बना दिया है।

देश की विविधता उसकी सबसे बड़ी ताकत है। इसलिए कोई भी ऐसी प्रवृत्ति जो सामाजिक एकता को कमजोर करे सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा दे या समाज के अलग-अलग वर्गों में अविश्वास पैदा करे वह अंततः पूरे राष्ट्र के लिए खतरा बन जाती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी समुदाय संयम संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनाएं। महात्मा गांधी का सत्याग्रह और अहिंसा का मार्ग आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना स्वतंत्रता आंदोलन के समय था। सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता की रक्षा के लिए हमें उसी रास्ते पर लौटना होगा क्योंकि अहिंसा और परस्पर सम्मान ही किसी भी सभ्य समाज की वास्तविक नींव हैं।