मथुरा में मतदान के आंकडे दे रहे दगा तो प्रत्याशी जीत के लिए आजमा रहे टोने-टोटके

किसी भी सीट पर नही एक तरफा माहौल, कहीं जबर्दस्त टक्कर तो कहीं त्रिकोणीय मुकाबला
मथुरा। विधान सभा चुनाव के प्रथम चरण में सम्पन्न हुए मतदान के बाद जिले की पांचों सीटों पर जबर्दस्त टक्कर के आंकडे प्राप्त हो रहे है। ऐसा कोई भी विधान सभा क्षेत्र नही है जहां चुनाव मैदान में उतरा कोई भी प्रत्याशी दावे के साथ अपनी जीत बता रहा हो। ऐसे में टोने-टोटके जैसी चीजों की तरफ भी प्रत्याशियों का ध्यान जा रहा है। यही कारण है कि अधिकतर प्रत्याशी पंडित मौलवियों के कहने पर उनके समझाये उपायों पर भी हाथ आजमाने में लगे है। प्रथम चरण के मतदान के दौरान जनपद की सभी पांचों सीटों पर इस बार कांटे की टक्कर देखने को मिली है। फिर वह चाहे कैबिनेट मंत्रियों की सीटें हो या फिर कई बार से एक ही विधायक को चुनते रहने वाली विधान सभा हो। इस बार वहां भी क्षेत्रीय जनता का रूख कुछ अलग ही दिखाई दे रहा है। हम बात कर रहे है प्रदेश के ऊर्जा मंत्री श्रीकान्त शर्मा के विधान सभा क्षेत्र मथुरा की यहां भी इस बार उनको विजय प्राप्त होने को लेकर दावे करना आसान नही है। क्योंकि यहां उन्हीं की पार्टी के बागी एसके शर्मा ने हालात बदल दिये है। हालांकि भाजपा से नाराज होकर बसपा में शामिल हुए एसके शर्मा की चुनाव मैदान में उपस्थिति को भाजपाई अपने पक्ष में ही मानकर चल रहे है। भाजपाईयों का कहना है कि भाजपा प्रत्याशी के परिवार के कुछ लोगों की वजह कुछ लोग उनसे नाराज हो गये थे लेकिन उन नाराज वोटर का वोट उनके मुख्य विपक्षी प्रत्याशी को न जाकर उनको मिला है जिससे भले ही उनका मत प्रतिशत इस बार कम हुआ हो मगर फिर भी उनकी जीत पक्की है। वहीं काग्रेस प्रत्याशी प्रदीप माथुर के पक्ष में हुए मतदान की बात करें तो ब्राह्मण वोटर के अलावा हर समाज के मतदाता पर उनकी अच्छी पकड़ है फिर चाहें मुस्लिम हों या फिर वैश्य, जाटव सभी वर्गों में उनके वोटर है। मुसलमानों ने तो उन्हें इस बार पूरी सिद्दत के साथ वोट किया है। रही बात एसके शर्मा की तो वह बसपा के सिम्बल पर चुनाव में उतरने के साथ ही पूर्व भाजपाई भी रहे है। ब्राह्मण मतदाताओं में उनकी भी अच्छी पकड़ है जाटव समाज का उनको पूरा वोट पड़ा है जिससे वह इस बार प्रमुख प्रत्याशियों के गणित को बदलते प्रतीत हुए है।
मांट विधान सभा में इस बार त्रिकोणीय मुकाबले की चर्चा है। यहां भाजपा को पूर्व में सम्मन जनक मत मिले थे। रालोद और सपा अलग-अलग चुनाव में उतरे थे। जो इस बार एक साथ मिलकर लडे है यदि दोनों को पिछली विधान सभा में मिले मत ही मिल जाते है तो यह इनकी एतिहासिक जीत हो सकती है। रही बात इस सीट से लगातार 8 बार विधायक रहे राजनीति के चाणक्य के रूप में विख्यात व क्षेत्र के प्रत्येक नागरिक को उनके नाम से पहचानने वाले पं. श्याम सुन्दर शर्मा की तो पहले भी कई बार की सुनामियों को पार करने में महारथ हांसिल कर चुके है। इसलिए इस सीट पर भी कोई अपनी जीत का यदि मतगणना से पूर्व एलान करता है तो यह उसका पागलपन ही कहा जायेगा।
अब बात करते है हर चुनाव के बारी -बारी से अपने चिरपरिचित चेहरों को विधायक बनाने वाली विधान सभा छाता की। यहां कैबिनेट मंत्री चौ. लक्ष्मीनारायण की जीत को लेकर कोई भी दाव बेमानी ही होगी क्योंकि इतिहास की माने तो ये सीट इस बार सपा-रालोद गठबंधन प्रत्याशी के खाते में जानी चाहिये लेकिन भाजपा प्रत्याशी का स्वयं का मानना है कि यह चुनाव उनका नही श्रीरामजी का था। तो रामजी तो कुछ भी कर सके है इतिहास किया वह तो भूगोल के अलावा और भी कुछ बदल सकते है। गोवर्धन विधान सभा में भाजपा का नया चेहरे को केवल जीत का सेहरा योगी की लोकप्रियता ही पहना सकती है क्योंकि यहां बसपा के पूर्व विधायक द्वारा उन्हें कडी टक्कर दी गयी है।
रालोद-सपा गठबंधन प्रत्याशी द्वारा भी यहां से जोर-शोर से अपना चुनाव प्रचार किया गया है इसलिए यहां भी त्रिकोणीय मुकाबला है। बल्देव विधान सभा में इस बार जाट मतदाताओं के एक जुट होकर वोट किये जाने की चर्चांओं ने यहां भाजपा और गठबंधन प्रत्याशी के मध्य कांटे की टक्कर का माहौल बना दिया है। यहाँ चर्चाओं में लोग रालोद सपा प्रत्याशी बबिता को जिता रहे है। भाजपाई कह रहे कि पूरन प्रकाश ही जीतेंगे।