Jharkhand: परीक्षा की विश्वसनीयता ही युवाओं के भविष्य की गारंटी

झारखंड की राजधानी रांची में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर चल रहा छात्र आंदोलन केवल कुछ परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं का विरोध नहीं है। यह उस भरोसे का संकट है जिस पर लाखों युवा वर्षों की मेहनत और अपने परिवार की उम्मीदें टिकाए बैठे हैं। छात्रों का आरोप है कि जेपीएससी और जेएसएससी की परीक्षाओं में कथित धांधली और पेपर लीक जैसी घटनाओं ने उनकी मेहनत और भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। उनकी सीबीआई जांच और जरूरत पड़ने पर प्रभावित परीक्षाओं को रद्द कर दोबारा कराने की मांग इसी बेचैनी को सामने रखती है। सरकार को छात्रों की मांगों को केवल आंदोलन या राजनीतिक दबाव के रूप में नहीं देखना चाहिए। प्रतियोगी परीक्षा में शामिल युवा कई वर्षों तक तैयारी करता है। उसके पीछे परिवार की आर्थिक क्षमता और माता-पिता की उम्मीदें जुड़ी होती हैं। ऐसे में परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी का आरोप लगना भी उसके भीतर व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करता है। इसलिए जांच निष्पक्ष होने के साथ-साथ निष्पक्ष दिखाई देना भी जरूरी है। परीक्षा रद्द करना भी कोई सामान्य प्रशासनिक फैसला नहीं है। इससे हजारों छात्रों का समय और मेहनत फिर दांव पर लगती है। उम्र की सीमा के करीब पहुंच चुके अभ्यर्थियों के लिए इसका असर और गंभीर हो सकता है। इसलिए सरकार को स्पष्ट मानक तय करने होंगे कि व्यापक गड़बड़ी की स्थिति में परीक्षा रद्द होगी या केवल प्रभावित केंद्रों पर दोबारा परीक्षा कराई जाएगी। निर्णय भावनाओं या दबाव में नहीं बल्कि ठोस जांच और प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए।

झारखंड सरकार द्वारा छात्रों से बातचीत के लिए चार सदस्यीय दल का गठन संवाद की दिशा में सकारात्मक कदम है। लेकिन संवाद केवल बैठक और आश्वासन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। छात्रों को यह स्पष्ट बताया जाना चाहिए कि उनकी कौन सी मांग स्वीकार की जा रही है और किन मामलों में जांच के बाद फैसला होगा। उन्हें समयबद्ध रोडमैप चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार इस संकट को समस्या मानकर टालेगी या इसे भर्ती व्यवस्था में व्यापक सुधार का अवसर बनाएगी। प्रश्नपत्र की सुरक्षा से लेकर परीक्षा केंद्रों की निगरानी और परिणाम तक पूरी प्रक्रिया को तकनीकी रूप से सुरक्षित और पारदर्शी बनाना होगा। डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था सीसीटीवी बायोमेट्रिक सत्यापन ट्रैकिंग और स्वतंत्र ऑडिट जैसी व्यवस्थाओं के साथ अधिकारियों और निजी एजेंसियों की जवाबदेही भी तय करनी होगी।

छात्रों की भी जिम्मेदारी है कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण रहे। वहीं सरकार को भी छात्रों को विरोधी या अपराधी की नजर से देखने के बजाय उनकी चिंताओं को सुनना होगा। लोकतंत्र में सवाल उठाना अधिकार है और उसका जवाब देना सरकार की जिम्मेदारी। आज का युवा केवल सरकारी नौकरी नहीं मांग रहा। वह यह भरोसा मांग रहा है कि ईमानदारी से की गई मेहनत का परिणाम उसे मिलेगा। यदि परीक्षा व्यवस्था से यह भरोसा टूट गया तो नुकसान केवल कुछ अभ्यर्थियों का नहीं बल्कि पूरे समाज का होगा। इसलिए झारखंड सरकार के सामने चुनौती साफ है—आंदोलन को दबाना नहीं बल्कि उसके पीछे छिपे अविश्वास को खत्म करना। सत्य पारदर्शिता और न्याय के जरिए ही यह भरोसा लौटाया जा सकता है। सरकार यदि यह सुनिश्चित कर सके कि झारखंड में नौकरी योग्यता से मिलेगी और प्रश्नपत्र पैसे या प्रभाव से नहीं बिकेगा तो यही इस आंदोलन का सबसे सार्थक समाधान होगा।