यूपी में निकाय चुनाव टल सकते है अप्रैल-मई माह तक

मथुरा, (राजपथ मथुरा ब्यूरो)। निकाय चुनाव के लिए उ.प्र.सरकार की ओर से जारी की गयी आरक्षण की अनंतिम सूची के बाद निकाय चुनाव मैदान में उतरने के लिए लोगों में जो जज्बा, उत्साह और जोश देखा जा रहा था उस पर मा. उच्च न्यायालय के द्वारा लाये गये स्थगन के आदेश ने पानी डालने का काम किया है। हालांकि लोगों को आगामी 20 दिसम्बर को न्यायालय द्वारा सुनाये जाने वाले फैसले से उम्मींदें है। वहीं न्यायालय द्वारा स्थगन की अवधि को लगातार बढाये जाने से सरकार की मंशा अब बदलती प्रतीत हो रही है। सूत्रों की माने तो उक्त चुनावों को सरकार करीब 3 माह अप्रैल-मई तक टाल सकती है। इसकी प्रमुख बजह आगामी फरवरी माह मेें स्नातक विधान परिषद के चुनाव होना माना जा रहा है इसके लिए सरकार को जनवरी के तीसरे सप्ताह में अधिसूचना जारी करनी होगी। स्नातक विधान परिषद के चुनाव के बाद फरवरी माह के चौथे सप्ताह में शुरू होने वाली उप्र माध्यमिक शिक्षा परिषद बोर्ड परीक्षा भी निकाय चुनाव को विलंब कराने में अहम भूमिका निभायेंगी जो 27 मार्च तक चल सकती है। यानि की निकाय चुनाव कराने के लिए सरकार मार्च के बाद ही कोई फैसला ले सकती है। इस बीच आरक्षण की सूची जारी की जाती है तो निकाय चुनाव कराना अप्रैल माह से पूर्व संभव नही हो पायेगा। न्यायालय में आरक्षण को लेकर असहज हुई सरकार न्यायालय के आदेश के बाद निकाय चुनाव के लिए मेयर, चैयरमैन सहित पार्षद व वार्ड सदस्यों का भी आरक्षण दुबारा निर्धारित कर सकती है।
बीते दिनों जैसे ही अखबारों में निकाय चुनाव को लेकर आरक्षण की जानकारी लोगों को हुई तो चुनाव लडने के इच्छुक लोग तैयारियों जुट गये कुछ ने तो वाकायदा लोगों से उनका ध्यान रखने की गुहारें भी लगानी शुरू कर दी गयीं। इसी बीच एक याची के कोर्ट में सरकार द्वारा जारी आरक्षण को चुनौती की रिट पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय द्वारा आरक्षण सूची पर स्थगन का आदेश करते हुए सरकार को इसे आगामी आदेशों तक जारी न करने का फरमान सुना दिया गया। इस बीच जब सरकार को न्यायालय का फैसला कुछ ही दिन में आने का इंतजार था तब कोर्ट ने अपने स्थगन को आदेश को विस्तारित करते हुए 20 दिसम्बर तक कर दिया। ऐसे में वर्तमान में सरकार के सामने नयी परिस्थितियां पैदा हो गयीं है। जिसमें स्नातक विधान परिषद चुनाव के साथ ही बोर्ड परीक्षाओं को निर्धारित समय पर कराना निकाय चुनाव से कहीं अधिक आवश्यक है।
वहीं इस बीच सरकार द्वारा मेयर, चैयरमैन के अलावा पार्षद और वार्ड सदस्यों तक के लिये भी पुन: आरक्षण सूची जारी की जा सकती है।