मथुरा । आजकल जनपद में अब पहचान चेहरे से नहीं, कार के शीशे से होती है। सड़क पर निकलते ही हर दूसरी गाड़ी किसी न किसी जिलाध्यक्ष, उपाध्यक्ष, जिला प्रमुख, विधायक या प्रेस की चलती-फिरती घोषणा बन चुकी है। लगता है मानो पदों की फैक्ट्री खुल गई हो और स्टिकर उसकी सरकारी मोहर। इन स्टिकरों का उद्देश्य साफ है यह बताना कि गाड़ी वाला आम नागरिक नहीं है इसके नियम अलग हैं कानून इसके लिए वैकल्पिक है और सवाल पूछना बदतमीज़ी। लाल बत्ती हट गई, तो क्या हुआ? स्टिकर ने उसकी जगह ले ली।
सबसे दिलचस्प प्रजाति है ‘प्रेस’ लिखी गाड़ी। कभी-कभार पूछ बैठिए, किस मीडिया हाउस में काम करते हो?
जवाब में या तो नेटवर्क चला जाता है, या ज़ुबान। कोई कहेगा “फ्रीलांस”, कोई “ऑनलाइन” कोई यूट्यूबर और कुछ ऐसे देखेंगे जैसे आपने आधार कार्ड का नंबर मांग लिया हो। जवाब न मिले, पर रौब पूरा। यह स्टिकर-संस्कृति उस गहरी बीमारी का लक्षण है जहाँ पद सेवा का नहीं, धौंस का औज़ार बन चुका है। जहाँ जिम्मेदारी बोझ है, लेकिन विशेषाधिकार जन्मसिद्ध अधिकार। असली पत्रकार चुपचाप काम करता है और नकली प्रेस सायरन बनकर घूमता है। दुख इस बात का नहीं कि गाड़ियों पर स्टिकर लगे हैं, दुख इस बात का है कि सम्मान अब काम से नहीं, चिपकाने से मिल रहा है। और अगर यही हाल रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब सड़कों पर इंसान कम और पद ज़्यादा दौड़ते नज़र आएंगे।