परीक्षा प्रणाली में भरोसा लौटाना सबसे बड़ी जिम्मेदारी

देश की प्रतियोगी परीक्षाएं केवल नौकरियों और प्रवेश का माध्यम नहीं हैं बल्कि करोड़ों युवाओं के सपनों और भविष्य की नींव भी हैं। जब प्रश्नपत्र लीक होने जैसी घटनाएं बार-बार सामने आती हैं तो केवल एक परीक्षा प्रभावित नहीं होती बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। हाल के वर्षों में कई राज्यों में हुई पेपर लीक की घटनाओं ने लाखों छात्रों को मानसिक आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों में डाल दिया। यही कारण है कि यह मुद्दा अब केवल कानून व्यवस्था या राजनीति का नहीं बल्कि युवाओं के विश्वास का विषय बन चुका है। शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शन इसी असंतोष की अभिव्यक्ति हैं। छात्र संगठनों और विभिन्न सामाजिक समूहों का कहना है कि केवल दोषियों की गिरफ्तारी या नए कानून बना देने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी सुरक्षित और जवाबदेह बनाना होगा ताकि ईमानदार अभ्यर्थियों का भविष्य किसी भी प्रकार की अनियमितता से प्रभावित न हो।

सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा संबंधी कानून लागू करने जांच एजेंसियों को सक्रिय करने और आरोपियों के विरुद्ध कार्रवाई जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। यह आवश्यक भी है कि पेपर लीक जैसे संगठित अपराधों पर कठोर दंड मिले। लेकिन इसके साथ यह भी उतना ही जरूरी है कि परीक्षा संचालन में आधुनिक तकनीक का व्यापक उपयोग हो प्रश्नपत्रों की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत बने और जिम्मेदारी तय करने की स्पष्ट व्यवस्था विकसित की जाए। केवल दंडात्मक कार्रवाई से अधिक महत्वपूर्ण ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जिसमें अपराध की संभावना ही न्यूनतम रह जाए। दूसरी ओर यह भी स्वीकार करना होगा कि न्याय में अनावश्यक विलंब छात्रों के विश्वास को कमजोर करता है। ऐसे मामलों की जांच और सुनवाई समयबद्ध होनी चाहिए ताकि दोषियों को शीघ्र दंड मिले और निर्दोष अभ्यर्थियों को वर्षों तक अनिश्चितता का सामना न करना पड़े। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ न्यायपालिका और परीक्षा संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।

लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। यदि बड़ी संख्या में छात्र अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं तो सरकार को इसे केवल आंदोलन नहीं बल्कि युवाओं की वास्तविक पीड़ा के रूप में देखना चाहिए। संवाद हर लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति है। छात्र प्रतिनिधियों शिक्षाविदों परीक्षा विशेषज्ञों और सरकार के बीच सार्थक बातचीत से ऐसे समाधान निकल सकते हैं जो भविष्य में इस प्रकार के संकटों को रोक सकें। साथ ही आंदोलन भी पूरी तरह शांतिपूर्ण और संवैधानिक दायरे में रहना चाहिए। हिंसा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान या अराजकता किसी भी न्यायसंगत मांग की नैतिक शक्ति को कमजोर करती है। छात्रों की सबसे बड़ी ताकत उनके तर्क उनकी एकजुटता और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने में है।

अंततः यह मुद्दा किसी एक मंत्री या किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। यह देश के करोड़ों युवाओं की आशाओं शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और शासन की जवाबदेही से जुड़ा प्रश्न है। आवश्यकता ऐसी परीक्षा प्रणाली विकसित करने की है जिसमें पारदर्शिता सुरक्षा और निष्पक्षता सर्वोच्च प्राथमिकता हो। जब युवाओं का विश्वास मजबूत होगा तभी देश की प्रतिभा को सही दिशा मिलेगी और भारत एक सशक्त ज्ञान आधारित राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ सकेगा।