यूपीआई पर शुल्क

2016 में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लिया गया नोटबंदी का फैसला अब भी भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था में बहस का विषय बना हुआ है। उस समय सरकार ने दावा किया था कि नोटबंदी के जरिए आतंकवाद की कमर तोड़ी जाएगी, काले धन पर प्रभावी कार्रवाई होगी और देश तेजी से नकदी रहित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ेगा। हालांकि, दस साल बाद इन दावों की सफलता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि नोटबंदी से न तो काला धन पूरी तरह खत्म हुआ, न आतंकवाद पर निर्णायक अंकुश लगा और न ही देश नकदी से पूरी तरह मुक्त हो पाया। नोटबंदी के बाद सरकार ने डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चलाया। लोगों से अपील की गई कि वे नकदी के बजाय डिजिटल माध्यमों, खासकर यूपीआई, का इस्तेमाल करें। शुरुआत में यह व्यवस्था सुविधाजनक और आधुनिक विकल्प के रूप में सामने आई। छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े व्यापारियों तक डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ा। लेकिन अब यूपीआई लेन-देन पर प्रस्तावित शुल्क ने सरकार की उस नीति पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके तहत देश को कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाने का दावा किया गया था। सरकार ने घोषणा की है कि 2,000 रुपये से अधिक के व्यक्ति-से-व्यापारी यूपीआई लेन-देन पर 0.4 प्रतिशत मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लगाया जाएगा। उदाहरण के लिए, यदि कोई ग्राहक किसी व्यापारी को यूपीआई के माध्यम से 5,000 रुपये का भुगतान करता है, तो उस लेन-देन पर 20 रुपये का शुल्क बनता है। कई जगहों पर इस शुल्क की दरों और नियमों को लेकर अलग-अलग चर्चाएं सामने आई हैं, इसलिए अंतिम प्रभाव वास्तविक दिशानिर्देशों के आधार पर ही स्पष्ट होगा। सरकार का तर्क है कि यह शुल्क ग्राहक से सीधे नहीं लिया जाएगा, बल्कि व्यापारी या भुगतान सेवा प्रदाता के स्तर पर इसका निपटारा होगा।

हालांकि, आम उपभोक्ता की चिंता यह है कि व्यापारी इस अतिरिक्त लागत को किसी न किसी रूप में ग्राहकों पर डाल सकते हैं। वे वस्तुओं की कीमत बढ़ा सकते हैं, अलग से सेवा शुल्क ले सकते हैं या डिजिटल भुगतान स्वीकार करने से बच सकते हैं। ऐसे में यूपीआई को बढ़ावा देने के बजाय यह कदम डिजिटल भुगतान को हतोत्साहित कर सकता है। कांग्रेस ने इसी आधार पर इसे ‘द ग्रेट यूपीआई लूट’ करार दिया है। पार्टी का कहना है कि जब नोटबंदी के समय सरकार ने डिजिटल भुगतान को समाधान के रूप में प्रस्तुत किया था, तो अब उसी व्यवस्था पर शुल्क लगाने की जरूरत क्यों महसूस हुई। एमडीआर वह शुल्क है, जो डिजिटल भुगतान पूरा करने के लिए व्यापारी को बैंक, कार्ड नेटवर्क या भुगतान सेवा प्रदाता को देना पड़ता है। यूपीआई के मामले में लंबे समय से शून्य एमडीआर की नीति लागू रही है। इसका उद्देश्य छोटे दुकानदारों और आम उपभोक्ताओं के बीच डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देना था। यदि इस व्यवस्था में शुल्क जोड़ा जाता है, तो सबसे अधिक असर छोटे व्यापारियों पर पड़ सकता है। किराना दुकानों, रेहड़ी-पटरी वालों और छोटे सेवा प्रदाताओं के लिए प्रत्येक लेन-देन पर लगने वाला शुल्क उनकी कमाई को प्रभावित कर सकता है। यह सवाल भी उठ रहा है कि इस तरह का महत्वपूर्ण निर्णय संसद में पर्याप्त चर्चा के बाद क्यों नहीं लाया गया। बजट सत्र में वित्तीय नीतियों पर विस्तार से विचार-विमर्श का अवसर होता है। विपक्षी दलों का कहना है कि यूपीआई शुल्क जैसे फैसले पर संसद, व्यापारिक संगठनों, बैंकों और उपभोक्ता समूहों से सुझाव लिए जाने चाहिए थे। बिना व्यापक विमर्श के लिए गए निर्णय से पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यूपीआई के क्षेत्र में फोनपे, गूगल पे और पेटीएम जैसी कंपनियों की बड़ी भूमिका है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, यूपीआई बाजार में फोनपे की हिस्सेदारी लगभग 48.9 प्रतिशत, गूगल पे की 37.7 प्रतिशत और पेटीएम की करीब 8.3 प्रतिशत बताई जाती है। शेष हिस्सेदारी अन्य कंपनियों के पास है। फोनपे में अमेरिकी कंपनी वॉलमार्ट की बड़ी हिस्सेदारी है, जबकि गूगल पे अमेरिकी कंपनी का डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म है। इसलिए आलोचक आरोप लगा रहे हैं कि एमडीआर लागू होने से बड़ी भुगतान कंपनियों की आमदनी बढ़ सकती है और इसका बोझ अंततः भारतीय उपभोक्ताओं तथा छोटे व्यापारियों पर पड़ेगा।

नोटबंदी के समय नए नोटों में चिप होने जैसी अफवाहें भी खूब फैली थीं। सरकार और उसके समर्थकों ने डिजिटल अर्थव्यवस्था को भविष्य का रास्ता बताया था। आज, जब यूपीआई पर शुल्क लगाने की चर्चा हो रही है, तो वही सवाल फिर सामने खड़ा है—क्या डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना केवल संकट के समय की नीति थी, या सरकार वास्तव में इसे आम जनता के लिए स्थायी और सस्ता विकल्प बनाना चाहती है? नोटबंदी के दस साल बाद यह स्पष्ट है कि किसी भी आर्थिक नीति का मूल्यांकन केवल नारों और दावों से नहीं, बल्कि उसके वास्तविक परिणामों से होना चाहिए। यदि यूपीआई पर शुल्क लागू होता है, तो सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि इसका भार न तो उपभोक्ताओं पर पड़े और न ही छोटे व्यापारियों पर। अन्यथा कैशलेस अर्थव्यवस्था का सपना आम जनता के लिए सुविधा के बजाय एक और आर्थिक बोझ बन सकता है।