आतंकवाद पर शून्य सहिष्णुता ही राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार

 

भारत के सामने आतंकवाद आज भी सबसे गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों में से एक बना हुआ है। पिछले कई दशकों में देश ने सीमा पार से प्रायोजित आतंकवाद, घुसपैठ, हथियारों की तस्करी और कट्टरपंथी नेटवर्क के रूप में अनेक चुनौतियों का सामना किया है। समय-समय पर सुरक्षा एजेंसियों द्वारा ऐसे नेटवर्क का पर्दाफाश यह संकेत देता है कि आतंकवाद का खतरा समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि उसने अपने तौर-तरीकों को बदल लिया है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा हाल में कथित तौर पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़े एक संदिग्ध आतंकी नेटवर्क का भंडाफोड़ और चार आरोपियों की गिरफ्तारी भी इसी चुनौती की गंभीरता को रेखांकित करती है। जांच एजेंसियों का दावा है कि आरोपियों के संपर्क पाकिस्तान स्थित कथित हैंडलरों से जुड़े थे तथा वे दिल्ली-एनसीआर में बड़ी आतंकी साजिश की तैयारी कर रहे थे। हालांकि अंतिम सत्य न्यायिक प्रक्रिया और जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा, लेकिन प्रारंभिक जानकारी सुरक्षा व्यवस्था के प्रति निरंतर सतर्क रहने की आवश्यकता अवश्य बताती है।

भारत लंबे समय से यह आरोप लगाता रहा है कि पाकिस्तान की धरती से संचालित कुछ आतंकी संगठन और उनके समर्थक भारत की सुरक्षा को चुनौती देने का प्रयास करते रहे हैं। दूसरी ओर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इन आरोपों से इनकार करता रहा है और स्वयं को शांति का समर्थक बताता है। यही विरोधाभास दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली की राह को कठिन बनाता है। किसी भी पड़ोसी देश के साथ स्थायी और सामान्य संबंध तभी संभव हैं जब आतंकवाद और हिंसा के लिए किसी भी प्रकार का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन पूरी तरह समाप्त हो तथा अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का ईमानदारी से पालन किया जाए।

आतंकवाद का स्वरूप भी लगातार बदल रहा है। पहले जहां घुसपैठ और सीमा पार से हमलों पर अधिक जोर था वहीं अब सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड संचार माध्यमों, ड्रोन तकनीक और स्थानीय स्तर पर युवाओं को प्रभावित करने जैसे नए तरीके सामने आ रहे हैं। जांच एजेंसियों के अनुसार हाल के मामलों में डिजिटल नेटवर्क और आधुनिक तकनीक का उपयोग बढ़ा है। इससे सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो गई है। अब सुरक्षा केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रह गई बल्कि साइबर स्पेस, संचार तंत्र और सामाजिक ताने-बाने की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है।  पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपनी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। आधुनिक निगरानी प्रणाली, बेहतर खुफिया समन्वय, सीमा प्रबंधन, ड्रोन रोधी तकनीक और केंद्रीय एवं राज्य एजेंसियों के बीच बढ़ते तालमेल ने कई संभावित खतरों को समय रहते विफल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यदि किसी बड़ी साजिश को प्रारंभिक स्तर पर ही रोक दिया जाता है तो यह सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता और पेशेवर दक्षता का प्रमाण माना जाना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में सफलता का सबसे बड़ा पैमाना यही है कि संभावित खतरा घटना बनने से पहले ही निष्प्रभावी कर दिया जाए।

आतंकवाद का उद्देश्य केवल जान-माल की क्षति पहुंचाना नहीं होता बल्कि समाज में भय, अविश्वास और विभाजन पैदा करना भी होता है। भीड़भाड़ वाले स्थानों, धार्मिक स्थलों या महत्वपूर्ण संस्थानों को निशाना बनाने की कथित योजनाएं इसी मानसिकता का हिस्सा होती हैं। इसलिए आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष केवल सुरक्षा बलों का दायित्व नहीं बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। नागरिकों की सतर्कता, संदिग्ध गतिविधियों की समय पर सूचना, अफवाहों से बचाव और सामाजिक सौहार्द बनाए रखना इस लड़ाई के महत्वपूर्ण आधार हैं। भारत और पाकिस्तान के संबंधों का इतिहास अनेक उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। दोनों देशों के बीच कई बार संवाद की पहल हुई लेकिन अनेक अवसरों पर आतंकी घटनाओं ने विश्वास की प्रक्रिया को गहरा आघात पहुंचाया। ऐसे में यह स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि जब तक आतंकवाद के ढांचे पर प्रभावी कार्रवाई नहीं होती तब तक स्थायी शांति और विश्वास कैसे स्थापित होगा। किसी भी सार्थक वार्ता का आधार हिंसा का अंत और परस्पर विश्वास ही हो सकता है। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई के दौरान समाज संयम और विवेक बनाए रखे। किसी भी अपराधी की पहचान उसके अपराध से होती है न कि उसके धर्म, जाति या समुदाय से। लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इसी में है कि जांच एजेंसियां निष्पक्ष रूप से अपना कार्य करें, न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र रूप से चले और किसी निर्दोष व्यक्ति या समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह न पनपे।