पुणे में केतन अग्रवाल हत्याकांड ने एक बार फिर समाज को झकझोर दिया है। असीम संभावनाओं से भरे 26 वर्षीय युवक की हत्या उसकी मंगेतर ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर कर दी। इस घटना ने न केवल एक परिवार को उजाड़ दिया बल्कि रिश्तों, विवाह और सामाजिक मूल्यों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे पहले मेघालय में राजा रघुवंशी हत्याकांड भी इसी तरह के कारणों से चर्चा में आया था। ऐसे मामले अब अपवाद नहीं रह गए हैं बल्कि समाज के भीतर पनप रही गहरी समस्याओं की ओर संकेत कर रहे हैं।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि किसी व्यक्ति को किसी और से प्रेम था या वह तय विवाह नहीं करना चाहता था, तो उसने अपनी असहमति व्यक्त करने का साहस क्यों नहीं जुटाया। आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां बन रही हैं कि लोग अपने मन की बात कहने के बजाय अपराध का रास्ता चुनने लगे हैं। स्पष्ट है कि यह केवल व्यक्तिगत विकृति का मामला नहीं बल्कि सामाजिक संरचना की भी एक गंभीर विफलता है।
भारतीय समाज में आज भी प्रेम विवाह और अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनने को पूरी सहजता से स्वीकार नहीं किया जाता। विशेषकर बेटियों के मामले में परिवार और समाज की अपेक्षाएं अधिक कठोर दिखाई देती हैं। कई घरों में अपनी इच्छा प्रकट करना बदतमीजी, आधुनिकता का दुष्प्रभाव या पारिवारिक मूल्यों के विरुद्ध माना जाता है। परिणामस्वरूप अनेक युवक-युवतियां मानसिक दबाव और द्वंद्व का शिकार हो जाते हैं। हालांकि यह दबाव किसी भी प्रकार से हत्या जैसे जघन्य अपराध को उचित नहीं ठहरा सकता, लेकिन यह अवश्य बताता है कि संवादहीनता और सामाजिक दबाव किस प्रकार खतरनाक रूप ले सकते हैं।
दूसरी ओर, केवल महिलाओं से जुड़े अपराधों को आधार बनाकर पूरी युवा पीढ़ी या किसी एक वर्ग को कठघरे में खड़ा करना भी उचित नहीं है। देश में दहेज हत्याएं, घरेलू हिंसा और ससुराल में प्रताड़ना से जुड़ी घटनाएं भी लगातार सामने आती रहती हैं, जिनमें अनेक युवतियों की जिंदगी बर्बाद हो जाती है। यह स्थिति दर्शाती है कि समस्या किसी एक लिंग की नहीं बल्कि उस सामाजिक सोच की है, जिसमें व्यक्ति की इच्छा और स्वतंत्र निर्णय का सम्मान अभी भी पूरी तरह स्थापित नहीं हो पाया है।
समय की मांग है कि परिवारों में खुला संवाद बढ़े और बच्चों को अपनी राय रखने का अधिकार मिले। माता-पिता को यह समझना होगा कि आज की पीढ़ी अपने जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों में भागीदारी चाहती है। असहमति को विद्रोह और अपनी पसंद को संस्कारहीनता मानने की प्रवृत्ति बदलनी होगी। भोपाल, नोएडा, इंदौर और पुणे जैसी घटनाएं केवल अपराध कथाएं नहीं हैं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी हैं कि यदि संवाद, विश्वास और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन नहीं बनाया गया, तो ऐसे हादसे भविष्य में और गंभीर रूप ले सकते हैं।