पश्चिमी बंगाल की बंपर वोटिंग रचेगी नया इतिहास

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण में रिकॉर्ड 89.93 प्रतिशत मतदान केवल एक आंकड़ा नहीं बल्कि लोकतंत्र की गहराती जड़ों का संकेत है। इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं का घरों से निकलकर मतदान केंद्रों तक पहुंचना यह साबित करता है कि अब जनता केवल दर्शक नहीं रहना चाहती बल्कि सत्ता के निर्माण में अपनी निर्णायक भूमिका निभाने को तैयार है। इस चुनाव में खास बात यह रही कि हर वर्ग ने सक्रिय भागीदारी दिखाई। महिलाओं युवाओं और बुजुर्गों की बढ़ी हुई मौजूदगी सामाजिक और राजनीतिक जागरूकता के विस्तार को दर्शाती है। लंबे समय से यह धारणा रही कि शहरी क्षेत्रों में मतदान कम रहता है लेकिन इस बार यह प्रवृत्ति टूटती नजर आई। यह बदलाव लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है।

जहां एक ओर मतदान का प्रतिशत उत्साहजनक रहा वहीं दूसरी ओर छिटपुट हिंसा और ईवीएम को लेकर उठे सवाल यह याद दिलाते हैं कि चुनावी प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी बनाना अभी भी चुनौती है। मुर्शिदाबाद और बीरभूम जैसे क्षेत्रों से आई घटनाएं बताती हैं कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कई बार असहिष्णुता का रूप ले लेती है। हालांकि इस बार केंद्रीय बलों और प्रशासन की सक्रियता ने बड़े स्तर की हिंसा को काफी हद तक रोका है जो एक सकारात्मक पहलू है। पश्चिम बंगाल का चुनावी इतिहास हिंसा और टकराव से जुड़ा रहा है। लेकिन इस बार अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण माहौल यह संकेत देता है कि सुधार की दिशा में कदम बढ़े हैं। फिर भी पूरी तरह शांतिपूर्ण चुनाव अभी लक्ष्य है जिसे हासिल करना बाकी है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस बंपर मतदान का फायदा किसे मिलेगा। तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों ही अपनी अपनी जीत के दावे कर रहे हैं। एक पक्ष इसे सत्ता विरोधी लहर मानता है जबकि दूसरा इसे सत्तारूढ़ दल के मजबूत आधार का संकेत बताता है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे अपनी नीतियों के समर्थन के रूप में देखा है जबकि भाजपा इसे बदलाव की चाह बता रही है। सच्चाई इन दावों के बीच कहीं छिपी है जिसका खुलासा मतगणना के दिन ही होगा। लेकिन इतना तय है कि इस बंपर मतदान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतंत्र की असली ताकत जनता के हाथ में है। जब मतदाता जागरूक होता है तो सत्ता का संतुलन अपने आप बदलने लगता है। अंततः बंगाल का यह चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं बल्कि लोकतांत्रिक चेतना की परीक्षा भी है। जनता ने अपने अधिकार का प्रयोग कर यह संदेश दिया है कि अब फैसले बंद कमरों में नहीं बल्कि मतदान केंद्रों पर होंगे।