दशहरा पर विशेष :भारत में ऐसे शुरू हुई रामलीला की परम्परा

-डॉ. नरेन्द्रकुमार मेहता-

भारत अपनी इन्द्रधनुषी-संस्कृति की एकता के सतरंगे सूत्रों में बांधकर धरती पर प्रेम और भाईचारे की ज्योति निरन्तर जलाये हुए हैं। श्रीरामकथा सत्य, अहिंसा सेवा, त्याग, तप, प्रेम, शील, करूणा शांति आदि का अक्षय भण्डार है। इस सन्दर्भ में हम नई पीढ़ी को चरित्र निर्माण की शिक्षा श्रीरामकथा के माध्यम से दे सकते हैं। आज से लगभग 40 से 50 वर्षों पूर्व तक भारत के नगरों-गाँवों में श्रीरामलीला के माध्यम से लोकशिक्षण-लोकरंजन होता रहा है। श्रीरामलीला का मंचन का आयोजन इन दोनों क्षेत्रों में भरपूर देखा गया। श्रीरामलीला समाज में चरित्र निर्माण एवं नैतिक शिक्षा का माध्यम रही है। वर्तमान समय में दूरदर्शन ने इसका स्थान लेकर घर-घर में रामायण का प्रसारण दिखाकर एक श्रेष्ठ कार्य का निर्वाह किया है। इस कारण श्रीरामलीला मंचन नगरीय तथा ग्रामीण क्षेत्रों में कम देखा जाता है किन्तु भारत में आज भी कई पूर्वोत्तर प्रान्तों में रामलीला का मंचन हो रहा है। विदेशों में आज रामलीला की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। रामलीला का संक्षिप्त ज्ञान युवा पीढ़ी को उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आलेख दिया जा रहा है।
श्रीरामलीला नाटकों की प्राचीन परम्परा में श्रीरामचरितमानस के आधार पर गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामलीलाओं की परम्परा भारत में स्थापित की है। वह देश-विदेश के विभिन्न क्षेत्रों में विकसित हुई तथा आज भी श्री रामलीला का मंचन हो रहा है। ऐसा माना जाता है कि वाराणसी की अस्सीघाट वाली रामलीला जो गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा स्थापित मानी जाती है। इसमें श्रीराम के राज्याभिषेक की तैयारी से लेकर श्रीराम के राज्याभिषेक तक की लीलाएँ अभिनीत होती है। वाराणसी के ही पल्लीपार (उस पार) रामनगर की लीलाओं में श्रीरामचरित विस्तार से प्रदर्शित किया जाता है। अन्य क्षेत्रों की रामलीलाएँ यद्यपि कथा की एकरूपता से जुड़ी रहती है परन्तु प्रदर्शन पद्धतियों की विभिन्नता के कारण वे अपना पृथक-पृथक स्वरूप रखती है। भारत में रामलीला की अनेक शैलियां हैं जिन सबका मूलाधार श्रीरामचरितमानस है परन्तु स्थानीय रुचि-संस्कृति और अन्य प्रभावों के अनुसार उनका साहित्य व प्रदर्शन-पद्धति भिन्न-भिन्न है।
रामलीला अभिनीत करने की पुरानी परिपाटी खुले मैदान में रात्रि में लीला करने की रही है। उस समय लीला स्थान भी समय-समय पर बदले जाते थे। किन्तु वर्तमान में मंचीय लीलाओं का प्रभाव बढ़ गया है और उसका रूप भी आधुनिक होता चला जा रहा है। कहीं-कहीं तो व्यावसायिक मंडली जो रामलीला करती है उसमें फिल्मी धुनों की भारी भरमार देखी गई हैं। दादरा, ठुमकी, थियेटरी धुन, विभिन्न भावाओं में लोकगीत का प्रयोग इन लीलाओं में देखा जाता है। वर्तमान में भारत में रामलीला के अनेक रूप और रंग देखने को मिलते हैं।
हमारे देश में श्रीरामलीलाओं में मथुरा नगर की रामलीला अपनी एक विशेष महिमा और गरिमा रखती है जिसके कारण पूरे भारत में आज भी लोकरंजन व लोकप्रिय है। मथुरा की रामलीला की परम्परा लगभग 150 से 175 वर्ष पुरानी है। जिसमें भी समयानुसार विकास और परिवर्तन होता देखा जा सकता है। यह रामलीला प्राचीन व आधुनिक प्रदर्शन शैलियों का सामंजस्य करके अपना रूप दिखाती रहती है। मथुरा की रामलीला पहले देवर्षि नारदजी के मोह के कथा प्रसंग से आरम्भ होती थी किन्तु बाद में गोस्वामी तुलसीदासजी का चरित्र और शिव विवाह की लीला और सम्मिलित कर दी गई। अब यह रामलीला पूरे भारत में लगभग 20 दिनों तक मंचन की जाती है।
मथुरा की रामलीला में कथोपकथन (संवाद) पात्रों द्वारा प्रस्तुत किए जाते हैं और चौपाइयाँ व्यासपीठ से गायी जाती है। व्यासपीठ से एक बार में एक या दो चौपाइयों ही गायी जाती हैं। सम्बन्धित पात्रों द्वारा उसके आधार पर संवाद बोलने के बाद चौपाई गाने का क्रम आगे बढ़ जाता है। वाराणसी की रामलीला की तरह मथुरा में नारद वाणी का सतत पाठ नहीं होता है। जबकि वाराणसी में रामलीला का पूरा पाठ होता है और उसके उपरान्त पात्र संवाद एक साथ बोलते हैं।
आज भी श्रीरामकथा की व्यापकता विश्वविदित है। भारत के अतिरिक्त नेपाल, तिब्बत, हिन्देशिया, जावा, सुमात्रा, बाली, श्याम, कम्बोदिया, थाईलैण्ड, लाओस, वर्मा तथा श्रीलंका में श्रीरामकथाओं की रचनाएँ लिखी गईं और आज भी भारत तथा इन देशों में रामलीला का व्यापक रूप से लोकप्रिय-लोकरंजन होने से मंचन किया जाता रहा है। हमारे देश में तो विशेष रूप से विजयादशमी (दशहरे) के 10-12 दिन पूर्व से ही रामलीला जगह-जगह प्रारम्भ हो जाती है। दशहरे के दिन श्रीराम आज भी नगरों में रावण-वध करते हैं, रावण दहण का कार्यक्रम महानगरों में आज भी आयोजित होता है।