यूपी में विपक्ष की चुनौती आपसी टकराव नहीं, एकजुटता है

उत्तर प्रदेश की राजनीति इस समय विपक्ष के लिए एक महत्वपूर्ण दौर से गुजर रही है। सत्ता पक्ष को घेरने के लिए विपक्ष के सामने कई मुद्दे हैं, लेकिन कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेता एक-दूसरे पर हमला करने में ही अपनी ऊर्जा खर्च करते दिखाई दे रहे हैं। सवाल यह है कि इस तरह की बयानबाजी से आखिर किसे फायदा होगा। विपक्षी दलों के बीच बढ़ता टकराव उनके समर्थकों को भ्रमित करने के साथ ही विपक्षी वोटों के बिखराव का कारण भी बन सकता है।
समाजवादी पार्टी की सबसे बड़ी राजनीतिक जमीन उत्तर प्रदेश है। इसलिए उसका कांग्रेस से राजनीतिक सवाल करना या अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कांग्रेस पर हमला करना असामान्य नहीं है। लेकिन कांग्रेस को भी यह समझना होगा कि उत्तर प्रदेश में लंबे समय से कमजोर संगठन के बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन ने उसे महत्वपूर्ण राजनीतिक स्थान दिलाया। ऐसे में दोनों दलों के बीच सहयोग की संभावनाओं को आपसी बयानबाजी से कमजोर करना समझदारी नहीं होगी। कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी चुनौती संगठन को मजबूत करना है। केवल चुनाव के समय पार्टी को सक्रिय करने से राजनीतिक आधार मजबूत नहीं होता। उसे पूरे पांच साल जनता के बीच रहना होगा और हर वर्ग के बीच अपना भरोसा कायम करना होगा। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के सामने भी अपने पारंपरिक समर्थक वर्ग से आगे बढ़कर दलितों, अति पिछड़ों और अन्य सामाजिक समूहों में स्वीकार्यता बढ़ाने की चुनौती है।

यही वह जगह है जहां कांग्रेस और सपा एक-दूसरे की पूरक साबित हो सकती हैं। कांग्रेस का सामाजिक आधार अपेक्षाकृत व्यापक है तो सपा का प्रदेश में मजबूत संगठन और क्षेत्रीय प्रभाव है। दोनों दल अलग-अलग अपनी पहचान बनाए रखते हुए यदि साझा मुद्दों पर साथ चलते हैं तो इसका राजनीतिक असर अधिक व्यापक हो सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि दोनों दलों के नेता सार्वजनिक मंचों से एक-दूसरे को कमजोर करने के बजाय अपने-अपने संगठन को मजबूत करने पर ध्यान दें। विपक्ष के सामने भाजपा से मुकाबले के अलावा एक और बड़ी चुनौती है। उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और अन्य दल भी अपना राजनीतिक आधार बनाए हुए हैं। ऐसे में विपक्षी मतों का विभाजन किसी भी दल के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए आपसी कटुता बढ़ाने के बजाय विपक्ष को यह तय करना होगा कि जनता के सामने वह किन मुद्दों और नीतियों के साथ जाना चाहता है। 2024 के लोकसभा चुनाव ने यह जरूर दिखाया कि सपा-कांग्रेस गठबंधन उत्तर प्रदेश में प्रभाव पैदा कर सकता है। लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनाव के समीकरण एक जैसे नहीं होते। विधानसभा चुनाव में स्थानीय उम्मीदवार, संगठन, क्षेत्रीय मुद्दे और सरकार के कामकाज का भी महत्वपूर्ण प्रभाव होता है। इसलिए 2024 के परिणामों को भविष्य की गारंटी मानने के बजाय उससे राजनीतिक सबक लेना अधिक उचित होगा। उत्तर प्रदेश में विपक्ष के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि वह अपनी ताकत आपसी लड़ाई में गंवाएगा या जनता के मुद्दों को केंद्र में रखकर व्यापक राजनीतिक विकल्प तैयार करेगा। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं लेकिन व्यक्तिगत हमले और लगातार एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश विपक्ष की विश्वसनीयता को कमजोर कर सकती है।

आखिरकार चुनाव नेताओं की बयानबाजी से नहीं बल्कि जनता के वोट से तय होते हैं। इसलिए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों को अपनी राजनीतिक ऊर्जा एक-दूसरे को कमजोर करने में नहीं बल्कि जनता के बीच अपना भरोसा मजबूत करने में लगानी चाहिए। यही उत्तर प्रदेश में विपक्ष की सबसे बड़ी जरूरत है।