अवैध निर्माण पर सख्ती

मेरठ के सेंट्रल मार्केट में अवैध निर्माण के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने देश की शहरी व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि कानून और मास्टर प्लान से खिलवाड़ को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि निर्माण पुराना हो गया है। अवैध निर्माण समय बीतने के साथ वैध नहीं हो जाता। यह रुख निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है लेकिन इसके साथ यह सवाल भी उतना ही जरूरी है कि ऐसी सख्ती केवल मेरठ तक सीमित क्यों रहे। रिपोर्टों के अनुसार मेरठ के एक जोन में ही हजारों अनधिकृत संपत्तियों की पहचान हुई है। यह आंकड़ा केवल एक शहर की समस्या नहीं दिखाता बल्कि देश की तेजी से फैलती शहरी व्यवस्था की कमजोरियों को सामने लाता है। दिल्ली-एनसीआर से लेकर उत्तर प्रदेश हरियाणा राजस्थान महाराष्ट्र और कर्नाटक तक अनेक शहरों में अवैध कॉलोनियां भू-उपयोग में मनमाना बदलाव बिना स्वीकृति निर्माण और नियमों के विपरीत व्यावसायिक गतिविधियां लंबे समय से चुनौती बनी हुई हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अवैध निर्माण आखिर खड़ा कैसे हो जाता है। कोई बड़ी कॉलोनी रातोंरात नहीं बसती। सैकड़ों मकान और दुकानें बनने में वर्षों लगते हैं। सड़कें बनती हैं बिजली और पानी के कनेक्शन पहुंचते हैं और लोग वहां रहने लगते हैं। ऐसे में संबंधित विकास प्राधिकरण नगर निकाय और प्रशासन को इसकी जानकारी क्यों नहीं होती। यदि किसी अवैध निर्माण पर वर्षों तक कार्रवाई नहीं होती तो जिम्मेदारी केवल निर्माणकर्ता की नहीं होनी चाहिए। उस पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए जिसने उसे पनपने दिया। विडंबना यह है कि जब अवैध निर्माण शुरू होता है तब अक्सर व्यवस्था की आंखें बंद रहती हैं और जब उसमें लोगों की जीवन भर की कमाई लग जाती है तब कार्रवाई की तलवार लटकने लगती है। कानून का पालन जरूरी है लेकिन कार्रवाई के साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि संगठित रूप से अवैध कॉलोनी बसाने वाले और व्यवस्था पर भरोसा करके छोटा मकान खरीदने वाले आम परिवार की जिम्मेदारी एक जैसी नहीं है। कानून सबके लिए समान हो लेकिन जिम्मेदारी की पूरी श्रृंखला भी सामने आनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती का उद्देश्य केवल इमारतें गिराना नहीं बल्कि कानून के शासन को मजबूत करना होना चाहिए। इसके लिए देशभर में अवैध निर्माण की पहचान के साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी होगी। मास्टर प्लान के उल्लंघन की निगरानी मजबूत करनी होगी और विकास प्राधिकरणों की कार्यप्रणाली की प्रभावी समीक्षा करनी होगी। सबसे जरूरी यह है कि अवैध निर्माण बनने के बाद कार्रवाई करने के बजाय उसे शुरू होने से पहले ही रोकने की व्यवस्था विकसित की जाए। मेरठ का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक शहर की सीमा से बाहर निकलकर देश की शहरी नियोजन व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। यदि जमीन महंगी होने और आवास की बढ़ती जरूरत के बीच अनियोजित विस्तार जारी रहा तो समस्या और गंभीर होगी। आम आदमी को सुरक्षित और वैध आवास उपलब्ध कराना सरकारों और विकास प्राधिकरणों की जिम्मेदारी है। केवल बाद में बुलडोजर चलाना इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मेरठ में कितने अवैध निर्माण हैं। असली सवाल यह है कि देश में कितने मेरठ हैं। सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती को किसी एक शहर तक सीमित कार्रवाई के रूप में देखने के बजाय इसे पूरे देश की शहरी व्यवस्था के लिए चेतावनी के रूप में लिया जाना चाहिए। कानून यदि सर्वोच्च है तो उसका पालन भी हर शहर में समान रूप से होना चाहिए। अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई के साथ जिम्मेदार तंत्र पर जवाबदेही तय होगी तभी सुनियोजित शहरों का सपना वास्तविकता बन सकेगा।