युवा मतदाताओं की बदलती राजनीति

देश की राजनीति में युवा मतदाताओं की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। शिक्षा रोजगार प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और भविष्य के अवसर जैसे मुद्दे नई पीढ़ी के लिए सीधे जीवन से जुड़े सवाल हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए युवाओं के बीच पहुंच बनाना अब केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा नहीं बल्कि राजनीतिक संवाद की बड़ी जरूरत बन गया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ओर से शुरू किया गया ‘छात्रों की गूंज’ अभियान इसी प्रयास का उदाहरण है। जून में कोटा से शुरू हुए इस अभियान में छात्रों और युवाओं से शिक्षा व्यवस्था रोजगार तथा प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों पर संवाद किया जा रहा है। कांग्रेस इसे देश के विभिन्न हिस्सों तक ले जाने की योजना पर काम कर रही है।

लेकिन युवाओं के बीच कार्यक्रम आयोजित करना और उनका विश्वास हासिल करना दो अलग बातें हैं। युवा मतदाता कोई एकरूप समूह नहीं है। अलग-अलग राज्यों और सामाजिक परिस्थितियों में उसकी प्राथमिकताएं बदलती हैं। इसलिए किसी सभा में जुटी भीड़ या किसी अभियान की व्यापकता को सीधे चुनावी समर्थन का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा।
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव का हालिया परिणाम इस जटिलता को समझने का एक अवसर देता है। 19 सितंबर को घोषित परिणाम में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने चार केंद्रीय पदों में से तीन पर जीत हासिल की जबकि उपाध्यक्ष पद निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने जीता। कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई को केंद्रीय पैनल में कोई पद नहीं मिला।

इस परिणाम को पूरे देश के युवा मतदाताओं का राजनीतिक फैसला मानना उचित नहीं होगा। विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव एक सीमित छात्र समुदाय के बीच होता है और उसके स्थानीय मुद्दे राष्ट्रीय चुनावों से अलग हो सकते हैं। फिर भी डूसू का परिणाम यह जरूर दिखाता है कि छात्र राजनीति में संगठन की जमीनी मौजूदगी महत्वपूर्ण है और युवा मतदाताओं के व्यवहार को केवल एक राजनीतिक धारा में बांधकर नहीं देखा जा सकता।

यही बात कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। कांग्रेस यदि युवाओं के बीच अपना आधार मजबूत करना चाहती है तो शिक्षा और रोजगार के सवालों को लगातार राजनीतिक कार्यक्रम का हिस्सा बनाना होगा। दूसरी ओर भाजपा के लिए भी यह मान लेना पर्याप्त नहीं होगा कि युवा मतदाता किसी दल के साथ स्थायी रूप से जुड़ा हुआ है। नई पीढ़ी अपने अनुभवों और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर राजनीतिक विकल्पों पर विचार करती है। आज का युवा केवल भाषण नहीं सुनना चाहता। वह जानना चाहता है कि उसकी शिक्षा का खर्च कैसे कम होगा प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता कैसे आएगी रोजगार के अवसर कैसे बढ़ेंगे और उसकी योग्यता के अनुरूप काम कैसे मिलेगा। राजनीतिक दल यदि इन सवालों को केवल चुनावी मंचों तक सीमित रखते हैं तो संवाद अधूरा रहेगा। युवा राजनीति में एक और बदलाव दिखाई दे रहा है। छात्र अब केवल परंपरागत राजनीतिक संगठनों के माध्यम से ही अपनी बात रखने तक सीमित नहीं हैं। डूसू में निर्दलीय उम्मीदवार की जीत भी इसी व्यापक तस्वीर का एक हिस्सा है। यह परिणाम किसी राष्ट्रीय राजनीतिक प्रवृत्ति का अंतिम प्रमाण नहीं है लेकिन इतना जरूर बताता है कि छात्र राजनीति में संगठन के साथ उम्मीदवार और स्थानीय मुद्दे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।