यूपीआई पर शुल्क की आहट से उठे सवाल

यूपीआई आज भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है। छोटे दुकानदार से लेकर बड़े कारोबारी तक इसके जरिए बिना अतिरिक्त शुल्क के भुगतान स्वीकार कर रहे हैं। ऐसे में यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर लगाने की संभावित व्यवस्था ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लोकसभा में 6 अगस्त 2026 को पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम एक्ट 2007 में संशोधन विधेयक पारित किया गया। इसके बाद यूपीआई और अन्य अधिसूचित इलेक्ट्रॉनिक भुगतानों पर एमडीआर लगाने की वैधानिक रोक हटने का रास्ता खुल गया है। सरकार का कहना है कि आम उपभोक्ता और छोटे व्यापारियों पर इसका असर नहीं पड़ेगा तथा यूपीआई भुगतान निशुल्क रहेगा। लेकिन बड़े लेन-देन पर विक्रेता से शुल्क वसूले जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। सरकार का तर्क है कि यूपीआई व्यवस्था को सुरक्षित और सुचारु बनाए रखने में सर्वर संचालन से लेकर साइबर सुरक्षा और तकनीकी विस्तार तक भारी खर्च होता है। इसलिए इसकी लागत की भरपाई का कोई रास्ता होना चाहिए। यह तर्क अपनी जगह उचित है लेकिन सवाल यह है कि क्या यूपीआई जैसी डिजिटल सार्वजनिक सुविधा को शुल्क आधारित व्यवस्था में बदलना सही होगा?

यूपीआई ने भारत में लेन-देन की लागत घटाने के साथ कारोबार को भी आसान बनाया है। क्यूआर कोड के जरिए भुगतान की सुविधा ने छोटे दुकानदारों को भी डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया है। यदि व्यापारियों पर शुल्क बढ़ता है तो उसका अप्रत्यक्ष असर वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ सकता है। इससे यूपीआई की सबसे बड़ी ताकत यानी सरल और कम लागत वाला भुगतान प्रभावित हो सकता है। यूपीआई पर शुल्क की बहस के बीच अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की रिपोर्ट भी चर्चा में है। रिपोर्ट में भारत की शून्य एमडीआर नीति और रूपे कार्ड को बढ़ावा देने जैसी नीतियों को अमेरिकी कंपनियों के लिए बाधा बताया गया था। यूपीआई के बढ़ते इस्तेमाल ने वीजा और मास्टरकार्ड जैसी अंतरराष्ट्रीय कार्ड कंपनियों के पारंपरिक कारोबार को चुनौती दी है। यही कारण है कि यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यूपीआई पर एमडीआर की राह खोलने के पीछे किसी बाहरी दबाव की भूमिका है। सरकार को इस आशंका पर स्पष्ट स्थिति सामने रखनी चाहिए ताकि देश की सबसे सफल डिजिटल भुगतान व्यवस्था को लेकर किसी तरह का भ्रम न रहे।
यूपीआई पर सरकार का खर्च जरूर है लेकिन इसके आर्थिक और सामाजिक लाभ कहीं अधिक व्यापक हैं। इसने भुगतान व्यवस्था को तेज बनाया है और व्यापार की लागत घटाने में योगदान दिया है। इसलिए यूपीआई को केवल खर्च के नजरिये से देखना उचित नहीं होगा।

सरकार को यदि शुल्क व्यवस्था लागू करनी भी है तो यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका बोझ छोटे व्यापारियों और आम जनता पर न पड़े। यूपीआई की सफलता उसकी निशुल्क और सहज व्यवस्था में ही है। जिस डिजिटल सुविधा ने देश में कारोबार को आसान बनाया है उसे राजस्व जुटाने का माध्यम बनाने के बजाय आर्थिक विकास के आधार के रूप में मजबूत करना ही दूरदर्शी नीति होगी।