चीन की विस्तारवादी नीति कोई नई बात नहीं है। वह लंबे समय से पड़ोसी देशों की सीमाओं और भूभाग को लेकर दावे करता रहा है। अरुणाचल प्रदेश के स्थानों के नाम बदलने की उसकी कोशिश भी इसी रणनीति का हिस्सा है। चीन पुराने और अप्रचलित नामों को अपनी आधिकारिक भाषा में इस्तेमाल कर यह धारणा बनाने की कोशिश करता है कि इन क्षेत्रों पर उसका अधिकार है। लेकिन किसी स्थान का नाम बदल देने से न जमीन बदलती है और न संप्रभुता। अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन की गतिविधियों का भारत लगातार स्पष्ट और दृढ़ता से विरोध करता रहा है। भारत के लिए यह केवल नामों का विवाद नहीं बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का प्रश्न है। अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न हिस्सा है। वहां लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत चुनाव होते हैं। प्रशासन काम करता है और विकास परियोजनाएं संचालित होती हैं। ऐसे में चीन द्वारा किसी गांव पहाड़ी नदी या अन्य स्थान का नया नाम रख देना जमीनी वास्तविकता को बदल नहीं सकता। पूर्व राजनयिक और रणनीतिक मामलों के जानकार कंवल सिब्बल ने भी चीन की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं पर चिंता जताई है। चीन की विस्तारवादी सोच केवल भारत तक सीमित नहीं है। भूटान समेत कई पड़ोसी देशों के साथ उसके सीमा विवाद और बढ़ता प्रभाव इस रणनीति की व्यापक तस्वीर सामने रखते हैं। भूटान का मामला भारत के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भौगोलिक रूप से छोटा होने के बावजूद भूटान की रणनीतिक स्थिति बेहद अहम है। भारत और भूटान के बीच लंबे समय से मजबूत और भरोसेमंद संबंध हैं। चीन यदि भूटान के सीमावर्ती क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ाता है तो उसका असर केवल भूटान तक सीमित नहीं रहेगा। इसका सीधा प्रभाव भारत की सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। विशेष रूप से सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत के लिए अत्यंत संवेदनशील है। यह संकरा भूभाग पूर्वोत्तर राज्यों को देश के मुख्य हिस्से से जोड़ता है। इसलिए भूटान के आसपास चीन की गतिविधियों को भारत केवल दो देशों के बीच सीमा विवाद मानकर नजरअंदाज नहीं कर सकता। यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और पूर्वोत्तर की रणनीतिक स्थिरता से जुड़ा विषय है।
तिब्बत का प्रश्न भी चीन की क्षेत्रीय रणनीति को समझने में महत्वपूर्ण है। भारत ने चीन के साथ संबंधों में कई बार संयम और संवाद को प्राथमिकता दी है। व्यापार बढ़ाने और आर्थिक रिश्ते मजबूत करने की कोशिशें भी हुई हैं। लेकिन सीमा विवाद यह स्पष्ट करता है कि आर्थिक संबंध अपने आप राजनीतिक और रणनीतिक मतभेद खत्म नहीं कर सकते।
भारत को इसी वास्तविकता के आधार पर चीन के साथ अपनी नीति आगे बढ़ानी होगी। आर्थिक सहयोग अपनी जगह है और राष्ट्रीय सुरक्षा अपनी जगह। भारत शांति और संवाद चाहता है लेकिन इसे उसकी कमजोरी नहीं समझा जाना चाहिए। सीमा और संप्रभुता के सवाल पर भारत को स्पष्ट और दृढ़ रुख बनाए रखना होगा। साथ ही भारत की रणनीति केवल चीन के दावों का जवाब देने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सीमावर्ती क्षेत्रों का आर्थिक और सामाजिक विकास भी राष्ट्रीय सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बेहतर सड़कें संचार शिक्षा स्वास्थ्य और रोजगार की सुविधाएं सीमा पर रहने वाले लोगों को मजबूत बनाती हैं। मजबूत सीमावर्ती क्षेत्र किसी भी बाहरी शक्ति के प्रभाव को बढ़ाने की संभावनाओं को कम करते हैं। चीन की चुनौती का जवाब केवल सैन्य शक्ति से भी नहीं दिया जा सकता। मजबूत कूटनीति आर्थिक क्षमता अंतरराष्ट्रीय सहयोग और पड़ोसी देशों के साथ भरोसेमंद संबंध भी उतने ही जरूरी हैं। भारत को भूटान के साथ अपने रिश्तों को और मजबूत करते हुए नेपाल बांग्लादेश म्यांमार और अन्य पड़ोसी देशों के साथ भी विश्वास बढ़ाना होगा।
भारत और चीन के बीच संबंधों का भविष्य केवल व्यापार से तय नहीं होगा। इसके लिए सीमा पर विश्वास एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान और पड़ोसी देशों के प्रति जिम्मेदार रवैया जरूरी है। चीन यदि नामों नक्शों और दावों के जरिए अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने की कोशिश करता है तो भारत को भी उतनी ही स्पष्टता से अपनी स्थिति सामने रखनी होगी। साफ संदेश यही होना चाहिए कि नाम बदलने की राजनीति से जमीन नहीं बदली जा सकती। चीन चाहे कितनी बार नक्शे बदले या नए नाम गढ़े अरुणाचल प्रदेश की वास्तविकता नहीं बदलेगी। भारत शांति चाहता है लेकिन अपनी जमीन सीमाओं और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के सवाल पर किसी प्रकार का समझौता नहीं कर सकता। यही दृढ़ता चीन की विस्तारवादी नीति का सबसे प्रभावी जवाब होगी।