प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल की मुलाकात ने पंजाब की राजनीति में पुराने सवालों को फिर से जीवित कर दिया है। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हुई इस मुलाकात को महज शिष्टाचार भेंट मानना शायद जल्दबाजी होगी। हालांकि दोनों दलों की ओर से गठबंधन को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है लेकिन राजनीतिक परिस्थितियां इस मुलाकात को नए सियासी समीकरणों की संभावनाओं से जोड़ रही हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारतीय जनता पार्टी और अकाली दल एक बार फिर साथ आएंगे और क्या अकाली दल की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में वापसी की जमीन तैयार हो रही है? भाजपा और अकाली दल का गठबंधन पंजाब की राजनीति का एक लंबा अध्याय रहा है। दोनों दलों ने कई चुनाव साथ लड़े और लंबे समय तक एक-दूसरे के स्वाभाविक सहयोगी बने रहे। अकाली दल की ग्रामीण पंजाब और सिख मतदाताओं में पकड़ थी तो भाजपा का प्रभाव शहरी और व्यापारिक वर्ग में रहा। दोनों की राजनीतिक ताकतों का यह मेल लंबे समय तक चुनावी सफलता का आधार बना रहा। लेकिन 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर यह रिश्ता टूट गया। अकाली दल ने केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के विरोध में राजग से अलग होने का फैसला किया। बाद में कृषि कानून वापस ले लिए गए लेकिन राजनीतिक दूरी पूरी तरह खत्म नहीं हुई। इस बीच पंजाब की राजनीति ने भी बड़ा बदलाव देखा। 2022 में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस और अकाली दल जैसे स्थापित दलों को पीछे छोड़ते हुए सत्ता हासिल की और भगवंत मान मुख्यमंत्री बने।
अब 2027 का चुनाव सामने है और परिस्थितियां फिर बदल रही हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के सामने कानून-व्यवस्था रोजगार आर्थिक स्थिति और सरकारी कर्मचारियों की मांगों जैसे मुद्दे हैं। विपक्ष इन सवालों को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर है। सीमावर्ती राज्य होने के कारण नशे और हथियारों की तस्करी भी गंभीर राजनीतिक मुद्दा है। दूसरी ओर राज्य के बढ़ते कर्ज और वित्तीय दबाव को लेकर भी सरकार की नीतियों पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे माहौल में भाजपा और अकाली दल की संभावित नजदीकी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि दोनों दल फिर एक साथ आते हैं तो चुनावी मुकाबले की तस्वीर निश्चित रूप से बदल सकती है। अकाली दल का पारंपरिक ग्रामीण आधार और भाजपा का बढ़ता संगठनात्मक प्रभाव मिलकर आम आदमी पार्टी तथा कांग्रेस के सामने एक मजबूत चुनौती पेश कर सकता है। लेकिन यह गठबंधन जितना राजनीतिक रूप से आकर्षक दिखाई देता है उतना ही कठिन भी है। कृषि कानूनों के दौर की राजनीतिक स्मृतियां अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। पंजाब में किसान केवल एक चुनावी वर्ग नहीं बल्कि राज्य की राजनीति का बेहद प्रभावशाली हिस्सा हैं। इसलिए भाजपा और अकाली दल को यदि दोबारा साथ आना है तो उन्हें पुराने मतभेदों से आगे बढ़कर किसानों और आम मतदाताओं को यह भरोसा दिलाना होगा कि उनका गठबंधन केवल सत्ता हासिल करने के लिए नहीं बल्कि पंजाब के हित में है। कांग्रेस भी इस समीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। 2022 में पार्टी की हार के पीछे संगठनात्मक कमजोरी और अंदरूनी खींचतान ने बड़ी भूमिका निभाई थी। यदि कांग्रेस इस बार अपने संगठन को मजबूत करती है और एकजुट होकर मैदान में उतरती है तो चुनावी मुकाबला और अधिक बहुकोणीय हो सकता है। पंजाब में विपक्षी मतों का विभाजन किसी भी दल की जीत या हार का बड़ा कारण बन सकता है। भाजपा के लिए पंजाब में चुनौती केवल सत्ता हासिल करने की नहीं है। उसे राज्य में अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता और संगठनात्मक आधार को और मजबूत करना होगा। वहीं अकाली दल के सामने अपने पारंपरिक जनाधार को वापस मजबूत करने के साथ नई पीढ़ी के मतदाताओं तक पहुंच बनाने की चुनौती है। रोजगार आर्थिक विकास किसान हित और पंजाब की सुरक्षा जैसे मुद्दे दोनों दलों की भविष्य की राजनीति की दिशा तय करेंगे।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पंजाब का मतदाता गठबंधन की राजनीति से अपरिचित नहीं है लेकिन वह अब पहले जैसा राजनीतिक व्यवहार भी नहीं करता। पिछले कुछ चुनावों में उसने स्थापित राजनीतिक दलों को सत्ता से बाहर कर नए विकल्पों को मौका दिया है। इसलिए केवल पुराने गठबंधन की वापसी से चुनावी सफलता की गारंटी नहीं मिल सकती। राजनीतिक दलों को नए पंजाब की आकांक्षाओं को समझना होगा। मोदी और सुखबीर बादल की मुलाकात ने फिलहाल सिर्फ संभावनाओं के दरवाजे खोले हैं। इसे गठबंधन की अंतिम घोषणा मानना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर है कि पंजाब की राजनीति में पुराने समीकरणों की नए सिरे से पड़ताल शुरू हो गई है।