धरती का बदलता मिजाज अब केवल वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों की चिंता नहीं रह गया है। इसका असर आम आदमी के जीवन से लेकर खेती स्वास्थ्य जल संसाधन और अर्थव्यवस्था तक साफ दिखाई देने लगा है। कहीं भीषण गर्मी लोगों को बेहाल कर रही है तो कहीं कुछ घंटों की मूसलाधार बारिश शहरों को जलमग्न कर रही है। कहीं किसान बारिश का इंतजार कर रहे हैं तो कहीं अत्यधिक वर्षा उनकी महीनों की मेहनत बहा ले जा रही है। मौसम का यह बदलता स्वरूप भविष्य के लिए गंभीर संकेत है। इसी बीच अल नीनो को लेकर चिंता स्वाभाविक है। प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान के सामान्य से अधिक गर्म होने से जुड़ी यह प्राकृतिक जलवायु घटना दुनिया के कई हिस्सों में तापमान वर्षा और हवाओं के स्वरूप को प्रभावित कर सकती है। भारत के लिए इसका महत्व इसलिए अधिक है क्योंकि देश की कृषि आज भी मानसून पर काफी निर्भर है। बारिश कम होने या उसके असमान वितरण से धान मक्का दाल और तिलहन जैसी फसलों पर असर पड़ सकता है। उत्पादन घटने की स्थिति में खाद्य वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं और इसका सीधा असर आम परिवारों की रसोई पर पड़ेगा।
समस्या का दूसरा पहलू भी गंभीर है। बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण वातावरण में नमी बढ़ रही है जिससे कई बार कम समय में अत्यधिक बारिश होती है। कुछ घंटों की तेज बारिश शहरों की जल निकासी व्यवस्था को ठप कर देती है। नदियों में बाढ़ आती है और पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। यानी बदलती जलवायु एक तरफ सूखे की चुनौती पैदा कर सकती है तो दूसरी तरफ अचानक बाढ़ का संकट भी खड़ा कर सकती है। इसका असर स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। अत्यधिक गर्मी से हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन का खतरा बढ़ता है जबकि बाढ़ के बाद जलजनित और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियां बढ़ सकती हैं। दूसरी ओर फसल नुकसान बिजली की बढ़ती मांग जल संकट तथा बाढ़ से बुनियादी ढांचे को होने वाला नुकसान सरकार और जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ाता है।
ऐसे में सरकारों की जिम्मेदारी केवल आपदा के बाद राहत और मुआवजे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। शहरों की जल निकासी व्यवस्था को मजबूत करना होगा। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण पर रोक लगानी होगी। जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन को प्राथमिकता देनी होगी तथा किसानों को समय पर मौसम आधारित सलाह उपलब्ध करानी होगी। कृषि में कम पानी वाली और सूखा तथा गर्मी सहने वाली फसलों को बढ़ावा देना भी जरूरी है। अल नीनो को रोका नहीं जा सकता लेकिन उसके प्रभाव से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। इसके लिए वैज्ञानिक चेतावनियों को गंभीरता से लेना होगा और विकास की योजनाओं में जलवायु जोखिम को शामिल करना होगा। धरती लगातार अपने बदलते स्वरूप के संकेत दे रही है। अब जरूरत इन संकेतों को समझने और समय रहते तैयारी करने की है। आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित भविष्य तभी संभव है जब विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम किया जाए।